रूस से तेल पर भारत का गणित बनाम अमेरिका का दबाव; ऊर्जा, प्रतिबंध और वैश्विक शक्ति संतुलन की टकराहट

 

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण | न्यूज़ डेस्क

भारत रूस से तेल लेता है तो अमेरिका आपत्ति क्यों जताता है? समझिए पूरा गणित

नई दिल्ली/वॉशिंगटन: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार पूरी तरह बदल गया। इसी बीच भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। 2021 से पहले भारत का रूस से तेल आयात बहुत कम था, लेकिन 2022 के बाद यह तेजी से बढ़कर भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 30–40% हिस्सा बन गया। सवाल उठता है — जब भारत को सस्ता तेल मिल रहा है, तो अमेरिका को दिक्कत क्यों होती है?

पहला गणित: प्रतिबंध और दबाव की राजनीति

अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए ताकि उसकी युद्ध क्षमता कमजोर हो। तेल रूस की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत है। अगर दुनिया रूस से कम तेल खरीदे, तो उसकी आय घटेगी — यही पश्चिमी देशों की रणनीति रही।
जब भारत जैसे बड़े खरीदार रूस से तेल लेते हैं, तो रूस को राजस्व मिलता रहता है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी देश रूस से खरीद कम करें।

दूसरा गणित: ऊर्जा सुरक्षा बनाम वैश्विक राजनीति

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% तेल बाहर से खरीदता है। ऐसे में सस्ता रूसी तेल भारत के लिए आर्थिक राहत है। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।
भारत का तर्क साफ है — वह अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर ऊर्जा खरीदता है, न कि राजनीतिक दबाव में।

तीसरा गणित: डॉलर और तेल का खेल

अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार अधिकतर अमेरिकी डॉलर में होता है। अमेरिका की वैश्विक ताकत का बड़ा हिस्सा “पेट्रो-डॉलर सिस्टम” से जुड़ा है। अगर देश डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्रा या वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था में व्यापार करते हैं, तो यह अमेरिकी वित्तीय प्रभाव को चुनौती दे सकता है।
भारत और रूस ने कुछ सौदों में वैकल्पिक भुगतान तंत्र की कोशिश भी की, जिससे अमेरिका की चिंता बढ़ी।

चौथा गणित: अमेरिका का संतुलित रुख

हालांकि अमेरिका ने भारत पर सीधे प्रतिबंध नहीं लगाए। वजह साफ है — भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका का अहम रणनीतिक साझेदार है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इसलिए अमेरिका सार्वजनिक रूप से “नैतिक दबाव” की बात करता है, लेकिन भारत के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहता।

कुल मिलाकर

यह मुद्दा सिर्फ तेल खरीद का नहीं है, बल्कि भू-राजनीति, आर्थिक हित, प्रतिबंध नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन का है।
भारत कहता है — “हम अपने राष्ट्रीय हित में ऊर्जा खरीदेंगे।”
अमेरिका कहता है — “रूस पर दबाव जरूरी है।”

यानी यह शतरंज की चाल है, जहां हर देश अपने हित का हिसाब लगा रहा है।

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