चिंचोटी (वसई ईस्ट): 26 जनवरी की शाम वसई का महाराणा प्रताप प्रांगण एक तरफ भक्ति और दानवीरता का गवाह बना, तो दूसरी तरफ कुछ लोगों के अमर्यादित आचरण ने पावन माहौल को दूषित कर दिया। जहाँ मारवाड़ी समाज ने अपनी परंपरा के अनुरूप दिल खोलकर सेवा की, वहीं कुछ लोगों ने अपनी अशिष्ट हरकतों से आयोजन की गरिमा को ठेस पहुँचाई।
शक्ति सिंह झाला: सेवा और समर्पण की अनूठी मिसाल
इस पूरे भव्य आयोजन के सूत्रधार रहे शक्ति सिंह झाला और उनका परिवार। चाहे वह 16 जनवरी से चल रही भव्य रामकथा में 'श्री सिया राम सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट' के माध्यम से किया गया बड़ा आर्थिक सहयोग हो, या इस भजन संध्या में विशाल भंडारे का आयोजन—झाला परिवार ने सेवा की नई ऊँचाई पेश की। मारवाड़ी समाज की यह उदारता ही है कि वे अपनी मेहनत की कमाई को धर्म और समाज के उत्थान में बिना संकोच लगा देते हैं।
रिपोर्टर के साथ अभद्रता: भक्ति या अनुशासनहीनता?
अफ़सोस की बात तब रही, जब इस पावन कार्यक्रम में कुछ लोगों ने मर्यादाओं की सीमा लांघ दी। कार्यक्रम की कवरेज कर रहे हमारे रिपोर्टर पर इन गुटखा प्रेमियों की 'लाल पिचकारी' की छींटें पड़ीं। जब पत्रकार ने इस गंदगी पर आपत्ति जताई, तो माफी मांगने के बजाय वे लोग भोजपुरी में अपशब्दों का प्रयोग करने लगे और विवाद पर उतारू हो गए। यह व्यवहार न केवल निंदनीय है बल्कि समाज की छवि को भी धूमिल करता है।
कार्यक्रम में शर्मिंदगी तब और बढ़ गई जब एक गुटखाधारी महानुभाव ने सारी मर्यादाएँ लाँघते हुए मंच पर मौजूद महिला गायिका पर पैसे फेंकने शुरू कर दिए।
अरे भाई! यह कोई फ़िल्मी गाना नहीं था, न कोई डांस बार, और न ही कोई स्टेज शो—यह एक धार्मिक आयोजन था। भक्ति के नाम पर की गई यह हरकत साफ़ दिखाती है कि कुछ लोग आज भी धर्म और संस्कार के बीच का फर्क नहीं समझ पाए हैं। ऐसा व्यवहार न सिर्फ़ अशोभनीय है, बल्कि पूरे समाज के लिए शर्मनाक भी है।
भंडारे में संग्रह की होड़
झाला परिवार ने जिस पवित्र भाव से भंडारा आयोजित किया, कुछ लोगों ने उसे 'लूट' का अवसर समझ लिया। भोजन करने के बाद भी घर ले जाने के लिए पैकेट पैक कराने की होड़ और आयोजन स्थल पर फैलाई गई गंदगी यह बताने के लिए काफी थी कि कुछ लोग सेवा का मूल्य और अनुशासन नहीं समझते।
निष्कर्ष: श्याम बाबा सब देख रहे हैं!
मारवाड़ी समाज और शक्ति सिंह झाला जैसे व्यक्तित्व अपनी उदारता से आयोजनों को सफल बनाते हैं, लेकिन ऐसे अनुशासनहीन लोग पूरी कौम का नाम खराब करते हैं। याद रखना चाहिए— भक्ति तालियों, सम्मान और श्रद्धा से होती है… न कि गुटखे, गंदगी और नोट उछालने से।
श्याम बाबा के दरबार में अनुशासन ही सबसे बड़ी भेंट है। अगली बार आएं, तो गुटखा और अपशब्दों को घर छोड़कर आएं, ताकि धर्म की गरिमा बनी रहे।
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