ऑपरेशन 'चिकन नेक': पूर्वोत्तर की सुरक्षा के लिए द्वितीय विश्व युद्ध की हवाई पट्टियों को पुनर्जीवित करेगा भारत

 

नई दिल्ली | विशेष सुरक्षा संवाददाता

बुधवार, 14 जनवरी 2026

भारत ने अपनी क्षेत्रीय अखंडता और पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक बड़ा 'रणनीतिक मास्टरप्लान' तैयार किया है। रक्षा मंत्रालय ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामरिक भाषा में 'चिकन नेक' (Chicken's Neck) कहा जाता है, के आसपास स्थित द्वितीय विश्व युद्ध के दौर की पुरानी और परित्यक्त हवाई पट्टों (Airstrips) को फिर से सक्रिय करने का निर्णय लिया है।

यह कदम ऐसे समय में आया है जब सीमावर्ती क्षेत्रों में बदलती भू-राजनीतिक स्थितियों और क्षेत्रीय अस्थिरता ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है।

1. क्यों खास है 'चिकन नेक' कॉरिडोर?

पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में स्थित यह संकरा गलियारा मात्र 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा है। यह भारत की मुख्य भूमि को आठ पूर्वोत्तर राज्यों (जिन्हें 'सेवन सिस्टर्स' और सिक्किम कहा जाता है) से जोड़ने वाला एकमात्र जमीनी रास्ता है।

·         संवेदनशीलता: यदि कोई शत्रु देश इस संकरे रास्ते को बाधित कर देता है, तो पूर्वोत्तर भारत का शेष देश से संपर्क पूरी तरह कट सकता है।

·         भौगोलिक स्थिति: यह क्षेत्र नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमाओं से घिरा हुआ है, जो इसे सैन्य दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाता है।

2. 'विंटेज' हवाई पट्टियों का पुनरुद्धार

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, मित्र देशों की सेनाओं ने जापानी आक्रमण को रोकने के लिए पूर्वोत्तर और बंगाल के क्षेत्रों में दर्जनों हवाई पट्टियां बनाई थीं। दशकों से उपेक्षित इन पट्टियों को अब भारतीय वायुसेना (IAF) और सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा आधुनिक रूप दिया जाएगा।

योजना के मुख्य बिंदु:

·         तेज तैनाती: इन हवाई पट्टों के सक्रिय होने से संकट के समय लड़ाकू विमानों, भारी मालवाहक विमानों (जैसे C-17 ग्लोबमास्टर) और सैनिकों की आवाजाही मिनटों में संभव हो सकेगी।

·         विकेंद्रीकृत रसद: मुख्य एयरबेस पर निर्भर रहने के बजाय, वायुसेना के पास अब कई वैकल्पिक लैंडिंग स्थल होंगे, जिससे दुश्मन के लिए हवाई हमला करके रसद रोकना मुश्किल हो जाएगा।

·         उन्नत निगरानी: इन स्थानों पर आधुनिक रडार और निगरानी प्रणालियां भी स्थापित की जा सकती हैं।

3. रक्षा मंत्रालय और BRO की भूमिका

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह व्यक्तिगत रूप से इस परियोजना की निगरानी कर रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस योजना को दो चरणों में लागू किया जाएगा:

1.      प्रथम चरण: उन हवाई पट्टों की पहचान और भूमि अधिग्रहण की कानूनी बाधाओं को दूर करना जो सामरिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण हैं।

2.      द्वितीय चरण: BRO द्वारा रनवे का सुदृढ़ीकरण, नाइट लैंडिंग सुविधाओं का विकास और ईंधन भंडारण केंद्रों का निर्माण।

4. रणनीतिक और मानवीय महत्व

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल युद्ध की तैयारी नहीं है, बल्कि इसके व्यापक प्रभाव होंगे:

·         सैन्य प्रतिरोध (Deterrence): इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना पड़ोसी देशों, विशेषकर चीन की विस्तारवादी गतिविधियों के खिलाफ एक कड़ा संदेश है।

·         आपदा प्रबंधन: पूर्वोत्तर भारत भूकंप और बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। सक्रिय हवाई पट्टियां मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) कार्यों में गेम-चेंजर साबित होंगी।

·         बांग्लादेश कारक: बांग्लादेश की वर्तमान अस्थिरता और वहां की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए, भारत अपनी पूर्वी सीमाओं पर किसी भी सुरक्षा चूक को बर्दाश्त नहीं करना चाहता।

5. विशेषज्ञों का विश्लेषण

सामरिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यह 'एक्ट ईस्ट' नीति का एक सैन्य विस्तार है।

"चिकन नेक की सुरक्षा केवल सड़क या रेल मार्ग से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। हमें 'हवाई श्रेष्ठता' (Aerial Superiority) की आवश्यकता है। पुराने हवाई क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना कम लागत में उच्च प्रभाव वाला समाधान है।" — सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी

परियोजना की चुनौतियां और समाधान (Table):

चुनौती

समाधान

अतिक्रमण

राज्य सरकारों के साथ मिलकर भूमि को फिर से सुरक्षित करना।

कठिन भूगोल

BRO की उन्नत इंजीनियरिंग और तकनीकी महारत का उपयोग।

पर्यावरण

इको-फ्रेंडली निर्माण तकनीकों का प्रयोग।

निष्कर्ष

'चिकन नेक' को सुरक्षित करना भारत की संप्रभुता के लिए अनिवार्य है। द्वितीय विश्व युद्ध की इन हवाई पट्टियों में नई जान फूंकना केवल सेना की ताकत बढ़ाएगा, बल्कि पूर्वोत्तर के विकास और सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। यह योजना आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना की 'स्ट्राइक पावर' को एक नई ऊंचाई देगी। 

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