गोवा में शिक्षा क्रांति: कक्षा 1 में प्रवेश के लिए अब 6 वर्ष की आयु अनिवार्य, NEP 2020 की राह पर सरकार

 

पणजी | राज्य ब्यूरो

बुधवार, 14 जनवरी 2026

गोवा सरकार ने राज्य की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में एक दूरगामी परिवर्तन करते हुए कक्षा 1 में प्रवेश की न्यूनतम आयु सीमा को संशोधित किया है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 1 में दाखिले के लिए बच्चे की आयु 6 वर्ष पूरी होनी अनिवार्य होगी। अब तक यह सीमा 5 वर्ष थी।

यह निर्णय केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के '5+3+3+4' ढांचे को पूर्ण रूप से लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

1. नीति का मुख्य उद्देश्य: मानसिक स्वास्थ्य और बेहतर विकास

शिक्षा मंत्री सुभाष फाल देसाई ने इस ऐतिहासिक बदलाव की व्याख्या करते हुए कहा कि बच्चों को बहुत कम उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा के बोझ तले दबाना उनके विकास के लिए हानिकारक है।

सरकार के मुख्य तर्क:

·         संज्ञानात्मक परिपक्वता (Cognitive Maturity): मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि 6 वर्ष की आयु में बच्चा अक्षरों, अंकों और सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए मानसिक रूप से अधिक परिपक्व होता है।

·         शारीरिक विकास: खेल-कूद और प्रारंभिक गतिविधियों के लिए अतिरिक्त समय मिलने से बच्चों का शारीरिक आधार मजबूत होता है।

·         तनाव में कमी: जल्दी स्कूल भेजने की "चूहा दौड़" को खत्म कर बच्चों पर से पढ़ाई का शुरुआती दबाव कम करना।

2. NEP 2020 और 'फाउंडेशनल स्टेज' का एकीकरण

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत, प्रारंभिक 5 वर्षों को 'फाउंडेशनल स्टेज' (3 साल प्री-स्कूल + 2 साल कक्षा 1-2) माना गया है। गोवा सरकार का यह फैसला इस ढांचे को मजबूती देता है ताकि बच्चा कक्षा 1 में प्रवेश करने से पहले तीन साल की गुणवत्तापूर्ण प्री-प्राइमरी शिक्षा (नर्सरी, LKG, UKG) पूरी कर सके।

3. अभिभावकों और प्री-स्कूलों की मिश्रित प्रतिक्रिया

जहाँ शिक्षाविद् इस फैसले की सराहना कर रहे हैं, वहीं जमीनी स्तर पर कुछ चिंताएँ भी उभर कर आई हैं:

·         अभिभावकों की चिंता: कई माता-पिता इस बात से परेशान हैं कि उनके बच्चे का एक साल "बर्बाद" हो जाएगा। साथ ही, प्री-स्कूलों की एक अतिरिक्त साल की फीस का बोझ भी मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ेगा।

·         प्री-स्कूल संचालकों का रुख: छोटे स्कूलों और नर्सरी संचालकों का मानना है कि इस नियम के बाद उन्हें अपने पाठ्यक्रम को फिर से तैयार करना होगा। कुछ विशेषज्ञों का यह भी डर है कि इससे प्ले-स्कूलों में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है।

4. विशेषज्ञों का विश्लेषण: गुणवत्ता ही असली चुनौती

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, केवल उम्र बढ़ाने से परिणाम नहीं बदलेंगे। नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्री-प्राइमरी स्तर पर बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है।

"उम्र बढ़ाना एक सही दिशा है, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आंगनबाड़ियों और निजी प्री-स्कूलों में शिक्षा का स्तर एक समान हो। 6 साल की उम्र में बच्चा जब कक्षा 1 में आए, तो वह रटने के बजाय सीखने के लिए तैयार होना चाहिए।" — शिक्षा विशेषज्ञ

5. प्रमुख बदलावों पर एक नज़र (Table)

विशेषता

पुरानी व्यवस्था

नई व्यवस्था (NEP आधारित)

प्रवेश आयु (Class 1)

5 वर्ष

6 वर्ष

प्री-प्राइमरी अवधि

अस्पष्ट / 2 वर्ष

3 वर्ष अनिवार्य

मुख्य फोकस

रट्टा और लेखन

खेल-आधारित और समग्र विकास

पाठ्यक्रम का बोझ

कम उम्र में भारी बैग

आयु के अनुरूप लचीला अधिगम

6. आगे की चुनौतियाँ और क्रियान्वयन

गोवा शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह बदलाव अचानक लागू नहीं किया जाएगा, बल्कि अभिभावकों को 'ग्रेस पीरियड' या ट्रांजिशन का समय दिया जाएगा ताकि जिन बच्चों की उम्र में कुछ महीनों का अंतर है, उन्हें समस्या हो।

मुख्य चुनौतियाँ:

1.      ग्रामीण बुनियादी ढांचा: क्या दूरदराज के गांवों की आंगनबाड़ियां 3 साल की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए तैयार हैं?

2.      मानकीकरण: निजी और सरकारी प्री-स्कूलों के बीच पाठ्यक्रम में समानता लाना।

निष्कर्ष

गोवा सरकार का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि बच्चों के बचपन को सुरक्षित करने की एक कोशिश है। यदि सरकार प्री-प्राइमरी शिक्षा की गुणवत्ता पर समान रूप से निवेश करती है, तो यह 'गोवा मॉडल' देश के अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है।

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