वसई–विरार चुनाव से पहले बाज़ार
में खामोशी:
राजस्थान
(मारवाड़ी) व्यापारी डरे, बोले – “धंधो करां, रोटी कमां, पण वोट री
बात में बोलणो मुश्किल हो गयो”
वसई–विरार महानगरपालिका चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहे हैं,
शहर के बाज़ारों में
एक अजीब सा डर और चुप्पी छा गई है।
हार्डवेयर, ज्वेलरी, किराना, प्रॉपर्टी और अन्य धंधों
से जुड़े राजस्थान
मूल
के मारवाड़ी व्यापारी आज खुलकर बोलने
से बच रहे हैं।
इन
व्यापारियों का साफ कहना
है –
“हम राजनीति में नहीं पड़ां, हम तो बस आपरो धंधो करां।”
लेकिन चुनाव आते ही माहौल ऐसा
बन जाता है कि
किस
पार्टी
के साथ दिखना है और किससे दूरी रखनी है, यह सोचकर ही
लोग सहम जाते हैं।
“हम
वोट आपरी मर्ज़ी रो देंगे, पण
खुल्ला साथ दिखावां तो डर लागे”
नाम
न छापने की शर्त पर
कई व्यापारियों ने बताया:
“हम
कोई झगड़ो नहीं चाहां। दुकान, लाइसेंस, माल—सब इसी शहर
में है। अगर गलत समझ बन गई तो
‘काल कंई धंधो बंद न करवा दें’,
इसी बात रो डर लागे।”
व्यापारियों
का कहना है कि उनके
समाज को एकतरफा
वोट
देने
वाला
बताकर पेश किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि
“हर आदमी आपरो दिमाग राखे, आपरो वोट राखे।”
लोकतंत्र
में डर री जगह
किणी?
मारवाड़ी
व्यापारी साफ शब्दों में कहते हैं:
·
हम
यहां मेहणत
री कमाई कर रहे हैं
·
टैक्स
भरां
·
लोकल
लोगों ने रोज़गार देवां
फिर
भी अगर चुनाव के टाइम यह
हालत हो जाए कि
“चुप रहो, किनारा रखो, नजर में मत आओ”
तो सवाल उठता है—
क्या यह लोकतंत्र
है या दबाव री राजनीति?
सभी
पार्टियों के नाम सीधी
बात
व्यापारी
समाज का कहना है:
·
हमें
शांति
रो माहौल चाहिए
·
हमें
डर
नहीं,
भरोसो
चाहिए
·
हमें
वोट बैंक नहीं, इज़्ज़त
वाला
नागरिक
समझा जाए
“हम वसई–विरार में रहे, यहीं मरां-जीवां, तो डर क्यूं?”
सवाल
जो सियासत को परेशान करते
हैं
·
क्या
चुनाव जीतने के लिए किसी
समाज में डर बैठाना ठीक
है?
·
क्या
धंधो करनां वाले लोग राजनीति से दूर नहीं
रह सकते?
·
क्या
वसई–विरार का चुनाव विकास पर होगो या दबाव पर?
आज
मारवाड़ी व्यापारी बस इतना कह
रहा है:
“हमें चैन सूं धंधो करवा दो, वोट हम खुद समझ लेंगे।”
यह
मुद्दा सिर्फ मारवाड़ी समाज का नहीं,
यह सवाल है लोकतंत्र
री आत्मा का।
0 Comments