नई दिल्ली | विशेष संवाददाता
बुधवार, 14 जनवरी 2026
भारत सरकार ने ग्रामीण भारत की जीवनरेखा मानी जाने वाली 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना' (MGNREGA) में एक बड़े संरचनात्मक परिवर्तन की घोषणा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने योजना के तहत गारंटीकृत कार्य दिवसों की संख्या को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। जहां एक ओर इसे ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ाने के प्रावधान ने एक नए राजनीतिक और आर्थिक विवाद को जन्म दे दिया है।
1. ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव की रूपरेखा
वर्ष 2005 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा शुरू की गई मनरेगा
योजना का मुख्य उद्देश्य
ग्रामीण परिवारों को 'काम का अधिकार' देना
था। दो दशकों तक
यह योजना संकट के समय (जैसे
कोविड-19 महामारी) ग्रामीण आबादी के लिए सुरक्षा
कवच बनी रही।
नया संशोधन क्या है?
·
कार्य
दिवसों में वृद्धि: अब पंजीकृत परिवारों
को साल में 100 के बजाय 125 दिन
का सुनिश्चित काम मिलेगा।
·
वित्तीय
मॉडल में बदलाव: केंद्र ने इस वृद्धि
के साथ ही फंडिंग पैटर्न
में बदलाव किया है, जिससे राज्यों की हिस्सेदारी बढ़
गई है।
2. सरकार
का तर्क: पलायन पर लगाम और
ग्रामीण मांग में वृद्धि
केंद्र
सरकार के प्रवक्ताओं के
अनुसार, यह निर्णय ग्रामीण
अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने
के लिए लिया गया है। सरकार का मानना है
कि:
·
आय
में वृद्धि: 25 अतिरिक्त दिनों के रोजगार से
सीधे तौर पर मजदूरों के
हाथ में अधिक पैसा आएगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग और मांग बढ़ेगी।
·
शहरी
पलायन में कमी: गांवों में अधिक दिनों तक काम उपलब्ध
होने से मजदूरों को
शहरों की ओर पलायन
करने की मजबूरी कम
होगी।
· बुनियादी ढांचा विकास: अधिक कार्य दिवसों का अर्थ है गांवों में तालाबों, सड़कों और चेक-डैमों जैसे स्थायी संपत्तियों का अधिक निर्माण।
3. विपक्ष का कड़ा प्रहार: "राज्यों पर थोपा गया वित्तीय बोझ"
विपक्ष ने इस कदम
को 'सहकारी संघवाद' की भावना के
विपरीत बताया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन
खरगे ने प्रतिक्रिया देते
हुए कहा कि केंद्र सरकार
श्रेय तो खुद ले
रही है, लेकिन बिल का भुगतान राज्यों
से करवा रही है।
प्रमुख आपत्तियां:
·
राज्यों
की माली हालत: समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश
यादव ने तर्क दिया
कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल
जैसे राज्य, जहाँ मनरेगा की मांग सबसे
अधिक है, पहले से ही वित्तीय
घाटे से जूझ रहे
हैं। अतिरिक्त खर्च का बोझ विकास
के अन्य कार्यों (शिक्षा, स्वास्थ्य) को प्रभावित करेगा।
·
कार्यान्वयन
की चुनौती: क्षेत्रीय दलों का आरोप है
कि केंद्र अक्सर मनरेगा का फंड समय
पर जारी नहीं करता, जिससे भुगतान में देरी होती है।
4. विशेषज्ञों
की राय: कागजी सुधार या जमीनी बदलाव?
ग्रामीण
अर्थशास्त्रियों ने इस फैसले
का स्वागत तो किया है,
लेकिन साथ ही कई चेतावनियां
भी दी हैं।
"केवल
दिनों की संख्या बढ़ाने
से तब तक फर्क
नहीं पड़ेगा, जब तक 'काम
की मांग' (Work Demand) और 'समय पर भुगतान' (Timely Payment) की समस्याओं को
हल नहीं किया जाता। वर्तमान में भी कई राज्यों
में औसत कार्य दिवस 50 से 60 दिन के बीच ही
सिमट कर रह जाते
हैं।" — एक
वरिष्ठ अर्थशास्त्री
विवाद के मुख्य बिंदु (Table):
|
पहलू |
लाभ |
चिंताएं |
|
रोजगार |
125 दिन
की कानूनी
गारंटी |
बजट
की कमी
से काम
देने में
आनाकानी |
|
पलायन |
स्थानीय
स्तर पर
अधिक अवसर |
राज्यों
के पास
फंड की
कमी से
योजना ठप
होने का
डर |
|
अर्थव्यवस्था |
ग्रामीण
मांग में
उछाल |
राजकोषीय
घाटा बढ़ने
की संभावना |
5. चुनौतियां
जो अभी भी बरकरार हैं
इस
बड़े बदलाव की सफलता के
सामने तीन प्रमुख दीवारें हैं:
1.
बजट आवंटन: क्या सरकार इस अतिरिक्त 25 दिनों
के बोझ को उठाने के
लिए केंद्रीय बजट में पर्याप्त प्रावधान करेगी?
2.
डिजिटल बाधाएं: आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) के कारण कई
मजदूर अभी भी प्रणाली से
बाहर हो रहे हैं।
3.
भ्रष्टाचार: जमीनी स्तर पर मस्टर रोल
में फर्जीवाड़ा और मशीनों का
अवैध उपयोग अभी भी एक बड़ी
चुनौती है।
6. भविष्य
की राह
भारत
के ग्रामीण परिदृश्य के लिए यह
फैसला एक "दोधारी तलवार" की तरह है।
यदि केंद्र और राज्य आपसी
तालमेल बिठाकर इसे लागू करते हैं, तो यह ग्रामीण
गरीबी उन्मूलन में मील का पत्थर साबित
हो सकता है। हालांकि, यदि वित्तीय विवाद बढ़ता है, तो इसका सीधा
खामियाजा उस गरीब मजदूर
को भुगतना पड़ेगा जिसे इस योजना की
सबसे ज्यादा जरूरत है।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि गैर-भाजपा शासित राज्य इस नए फंडिंग मॉडल को कितनी सहजता से स्वीकार करते हैं या यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है।
निष्कर्ष: मनरेगा में 125 दिनों का प्रावधान एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसकी सफलता "नियत" और "निधि" (फंड) के सही संतुलन पर निर्भर करेगी।
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