स्पोर्ट्स
में
विज्ञापन
की सच्चाई: खिलाड़ी सच में प्रोडक्ट इस्तेमाल करते हैं या सिर्फ पैसे के लिए प्रचार करते हैं?
आज
के समय में खेल (Sports) केवल मैदान तक सीमित नहीं
रह गए हैं। यह
एक बड़ा उद्योग बन चुका है,
जहाँ खिलाड़ियों की लोकप्रियता का
इस्तेमाल कंपनियाँ अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए करती
हैं। क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन और अन्य खेलों
में बड़े खिलाड़ी टीवी, सोशल मीडिया और होर्डिंग्स पर
अलग-अलग प्रोडक्ट्स का विज्ञापन करते
दिखाई देते हैं। ऐसे में आम जनता के
मन में यह सवाल उठता
है कि क्या खिलाड़ी सच में उन्हीं प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, जिनका वे प्रचार करते हैं, या यह सब सिर्फ पैसों के लिए होता है?
स्पोर्ट्स और ब्रांड एंडोर्समेंट का रिश्ता
ब्रांड
एंडोर्समेंट का मतलब होता
है किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा किसी उत्पाद या सेवा का
प्रचार करना। स्पोर्ट्स की दुनिया में
खिलाड़ी युवाओं के आदर्श (Role Model) माने जाते
हैं। उनकी फिटनेस, सफलता और अनुशासन लोगों
को प्रभावित करता है। इसी कारण कंपनियाँ खिलाड़ियों को भारी रकम
देकर अपने प्रोडक्ट का चेहरा बनाती
हैं। एक प्रसिद्ध खिलाड़ी
का एक विज्ञापन लाखों-करोड़ों रुपये का हो सकता
है।
क्या खिलाड़ी वही प्रोडक्ट इस्तेमाल करते हैं?
·
स्पोर्ट्स इक्विपमेंट (बैट, जूते, रैकेट, ग्लव्स)
·
फिटनेस और न्यूट्रिशन से जुड़े प्रोडक्ट (प्रोटीन, एनर्जी ड्रिंक – सीमित और नियंत्रित मात्रा
में)
इन
मामलों में खिलाड़ी अक्सर ब्रांड के साथ लंबे
समय का करार करते
हैं और प्रोडक्ट उनके
खेल प्रदर्शन से सीधे जुड़ा
होता है। उदाहरण के लिए, कोई
क्रिकेटर उसी कंपनी का बैट या
जूते इस्तेमाल करता है, जिसका वह विज्ञापन करता
है, क्योंकि यह उसके खेल
का हिस्सा है।
कहाँ सिर्फ पैसे का खेल होता है?
समस्या
तब आती है जब खिलाड़ी
ऐसे प्रोडक्ट्स का विज्ञापन करते
हैं, जिनका उनके खेल या जीवनशैली से
कोई सीधा संबंध नहीं होता, जैसे:
·
जंक
फूड
·
सॉफ्ट
ड्रिंक
·
पान
मसाला या गुटखा जैसे
उत्पाद
·
ऑनलाइन
बेटिंग या गेमिंग ऐप्स
इन
मामलों में अक्सर यह माना जाता
है कि खिलाड़ी स्वयं
इनका नियमित उपयोग नहीं करते। कई पूर्व खिलाड़ियों
और विशेषज्ञों ने स्वीकार किया
है कि ये
विज्ञापन
मुख्य
रूप
से पैसों के लिए किए जाते हैं, न कि प्रोडक्ट
की गुणवत्ता या व्यक्तिगत उपयोग
के कारण।
कानूनी और नैतिक पहलू
युवाओं और समाज पर प्रभाव
खिलाड़ियों का पक्ष
कई
खिलाड़ी यह तर्क देते
हैं कि उनका करियर
सीमित समय का होता है
और विज्ञापन उनकी आय का बड़ा
स्रोत है। वे यह भी
कहते हैं कि विज्ञापन करना
उनका पेशेवर काम है, जैसे किसी अभिनेता के लिए फिल्म
करना। कुछ खिलाड़ी अब अधिक सतर्क
हो रहे हैं और केवल उन्हीं
ब्रांड्स के साथ जुड़
रहे हैं, जिनसे वे व्यक्तिगत रूप
से सहमत हों।
बदलता ट्रेंड
हाल
के वर्षों में एक सकारात्मक बदलाव
भी देखने को मिला है।
कुछ खिलाड़ी अब जंक फूड,
तंबाकू और भ्रामक विज्ञापनों
से दूरी बना रहे हैं। सोशल मीडिया के दौर में
खिलाड़ी सीधे अपने फॉलोअर्स से जुड़ते हैं
और अपनी असली जीवनशैली दिखाते हैं, जिससे जनता को सच्चाई समझने
में मदद मिलती है।
निष्कर्ष
स्पोर्ट्स में विज्ञापन की दुनिया पूरी तरह काली या सफेद नहीं है। कुछ खिलाड़ी सच में उन्हीं प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, जिनका वे प्रचार करते हैं, खासकर जब वह उनके खेल और फिटनेस से जुड़ा हो। लेकिन कई मामलों में विज्ञापन केवल आर्थिक लाभ के लिए किया जाता है। ऐसे में खिलाड़ियों, कंपनियों और सरकार—तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि विज्ञापन ईमानदार, जिम्मेदार और समाज के हित में हों। जागरूक दर्शक और पाठक ही इस सिस्टम को बेहतर बना सकते हैं।
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