NEWSDESK | INTERNATIONAL GEOPOLITICS
दुनिया इस समय गहरे भू-राजनीतिक बदलावों के दौर से गुजर रही है। अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और मध्य-पूर्व के देशों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर शीत युद्ध जैसी स्थिति की ओर धकेल दिया है। कूटनीति, सैन्य शक्ति, ऊर्जा संसाधन और वैश्विक व्यापार अब केवल आर्थिक विषय नहीं रहे, बल्कि सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं।
अमेरिका-चीन तनाव और वैश्विक प्रभाव
संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार तेज़ होती जा रही है। दोनों देशों के रिश्ते व्यापार, तकनीक, ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर टकराव की स्थिति में हैं। अमेरिका चीन पर तकनीकी प्रतिबंधों के ज़रिये दबाव बना रहा है, जबकि चीन इसे अपने विकास को रोकने की साज़िश बता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप की चिंता
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक सहायता दिए जाने से रूस और नाटो देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है। यूरोप में ऊर्जा संकट, महंगाई और रक्षा खर्च में वृद्धि इसी संघर्ष का सीधा परिणाम मानी जा रही है। कई यूरोपीय देश अब अपनी रक्षा नीतियों पर दोबारा विचार कर रहे हैं।
मध्य-पूर्व में अस्थिरता
मध्य-पूर्व एक बार फिर वैश्विक जियो-पॉलिटिक्स का केंद्र बन गया है। इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दो हिस्सों में बांट दिया है। इस क्षेत्र में अमेरिका, ईरान और अरब देशों की भूमिका भी लगातार चर्चा में है। ईरान पर लगे प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर पश्चिमी देशों की चिंता बनी हुई है। किसी भी बड़े टकराव की स्थिति में वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संघर्ष
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी भू-राजनीतिक हलचल तेज़ है। ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका ताइवान की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्धता जताता रहा है। इस टकराव में जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य संघर्ष वैश्विक व्यापार मार्गों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
वैश्विक दक्षिण और नई कूटनीति
अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई विकासशील देश अब पारंपरिक शक्ति केंद्रों से दूरी बनाकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। वैश्विक दक्षिण के देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं, जिसमें किसी एक शक्ति का प्रभुत्व न हो। भारत जैसे देश संतुलित कूटनीति के ज़रिये अमेरिका, रूस और यूरोप सभी के साथ रिश्ते बनाए रखने की रणनीति अपना रहे हैं।
ऊर्जा, व्यापार और जियो-पॉलिटिक्स
ऊर्जा संसाधन अब जियो-पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं। तेल और गैस की आपूर्ति पर नियंत्रण रखने वाले देश वैश्विक राजनीति में अधिक प्रभावशाली हो गए हैं। रूस-यूरोप गैस विवाद, मध्य-पूर्व में तेल उत्पादन और अमेरिका की ऊर्जा नीति, सभी वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर रहे हैं। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार मार्गों, समुद्री रास्तों और सप्लाई चेन की सुरक्षा भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और बदलती भूमिका
संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और अन्य वैश्विक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई देशों का मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं तेजी से बदलती वैश्विक राजनीति के अनुरूप खुद को ढालने में विफल रही हैं। सुधारों की मांग तेज़ हो रही है, खासकर सुरक्षा परिषद की संरचना को लेकर। यदि इन संस्थाओं में बदलाव नहीं होता, तो देशों के बीच टकराव और बढ़ सकता है।
भविष्य की दिशा
विश्लेषकों का कहना है कि दुनिया एक नए जियो-पॉलिटिकल युग में प्रवेश कर चुकी है। यह दौर केवल सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि तकनीक, साइबर सुरक्षा, सूचना युद्ध और आर्थिक दबाव का भी है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि दुनिया सहयोग की राह चुनती है या टकराव की।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय जियो-पॉलिटिक्स इस समय अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व की अस्थिरता और एशिया-प्रशांत में बढ़ता तनाव, सभी मिलकर वैश्विक राजनीति को जटिल बना रहे हैं। दुनिया की दिशा अब इस बात पर निर्भर करेगी कि बड़े राष्ट्र टकराव की राजनीति को आगे बढ़ाते हैं या कूटनीति और संवाद के ज़रिये समाधान खोजते हैं।
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