ईरान में इस्लाम खत्म होने का सच: क्या फिर से जलने वाली है पारसी मंदिरों में पवित्र अग्नि

 

ईरान का वैचारिक महायुद्ध: क्या प्राचीन 'पारसी विरासत' दे रही है इस्लामी शासन को चुनौती?

ईरान आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ वर्तमान 'इस्लामी गणतंत्र' की सख्त पाबंदियां हैं, तो दूसरी तरफ 2,500 साल पुरानी उस 'फारसी महानता' की यादें, जब ईरान (फारस) दुनिया का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य हुआ करता था।

1. सुनहरी यादें: जब दुनिया पर था पारसियों का राज

इस्लाम के आगमन (7वीं सदी) से पहले, ईरान 'सासानी' और 'हखामनी' (Achaemenid) साम्राज्यों का घर था।

  • महान साइरस (Cyrus the Great): इन्होंने दुनिया का पहला मानवाधिकार चार्टर लिखा था।
  • ज़रथुस्त्र (Zoroaster): पारसी धर्म के पैगंबर, जिन्होंने दुनिया को 'अच्छी सोच, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म' (Humata, Hukhta, Huvarshta) का संदेश दिया।
  • अग्नि मंदिर: ईरान के कोने-कोने में पवित्र अग्नि जलती थी, जो शुद्धता का प्रतीक थी।

2. इस्लाम के बाद का बदलाव

7वीं शताब्दी में अरबों की जीत के बाद ईरान में धीरे-धीरे इस्लाम का प्रसार हुआ। लेकिन ईरानियों ने अपनी भाषा (फारसी) और अपनी संस्कृति (नौरोज़ - नया साल) को कभी नहीं छोड़ा। यही कारण है कि ईरान का इस्लाम, अरब देशों के इस्लाम से सांस्कृतिक रूप से बहुत अलग है।

3. वर्तमान संघर्ष: धर्म बनाम पहचान

आज ईरान की नई पीढ़ी के बीच पारसी प्रतीकों की लोकप्रियता बढ़ने के 3 मुख्य कारण हैं:

  • राष्ट्रवाद की वापसी: जब लोग सरकार से नाराज होते हैं, तो वे अपनी पुरानी जड़ों की ओर लौटते हैं। ईरानी युवाओं के लिए 'पारसी धर्म' अब केवल एक धर्म नहीं, बल्कि 'विद्रोह का एक प्रतीक' (Symbol of Resistance) बन गया है।
  • सांस्कृतिक गौरव: तेहरान की सड़कों पर युवाओं के गले में 'फरावहार' (पारसी प्रतीक) के लॉकेट दिखना आम बात है। यह मौजूदा धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ एक 'मौन विरोध' है।
  • नौरोज़ का महत्व: सरकार की आपत्तियों के बावजूद, आज भी ईरान का सबसे बड़ा त्यौहार 'नौरोज़' (पारसी नव वर्ष) है, न कि कोई इस्लामी त्यौहार।

4. क्या वाकई लोग धर्म बदल रहे हैं?

डच रिसर्च ग्रुप 'GAMAAN' के एक सर्वे के अनुसार, ईरान में अब एक बड़ी आबादी खुद को केवल 'मुस्लिम' कहलाना पसंद नहीं करती। कई लोग खुद को 'ईरानी', 'नास्तिक' या 'ज़रथुस्त्री' (पारसी) के रूप में पहचान दे रहे हैं।

सच्चाई यह है: लोग कानूनी तौर पर कागजों पर धर्म नहीं बदल रहे (क्योंकि इसकी सजा मौत हो सकती है), लेकिन दिल और दिमाग में वे अपनी प्राचीन पारसी पहचान को इस्लाम से ऊपर रख रहे हैं।

5. भविष्य की राह

ईरान में कोई "धार्मिक क्रांति" नहीं हो रही है, बल्कि एक "सांस्कृतिक पुनर्जागरण" (Cultural Renaissance) हो रहा है। ईरान के लोग इस्लाम को छोड़ना चाहते हैं या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन वे एक ऐसा देश जरूर चाहते हैं जहाँ धर्म व्यक्तिगत मामला हो और उनकी प्राचीन पारसी पहचान का सम्मान हो।

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