मास्को/कीव/जिनेवा | 17 जनवरी, 2026
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा भीषण युद्ध अब अपने तीसरे वर्ष के अंत की ओर बढ़ रहा है। 2026 की शुरुआत के साथ ही यह संघर्ष एक ऐसे चौराहे पर आ खड़ा हुआ है जहाँ एक तरफ शांति की धुंधली उम्मीदें हैं, तो दूसरी तरफ और अधिक विनाशकारी सैन्य रणनीति। दुनिया भर की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या 2026 इस रक्तपात का अंतिम वर्ष साबित होगा?
1. रणभूमि की ताज़ा स्थिति: गतिरोध और गहराता तनाव
2026 की शुरुआत में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। पूर्वी यूक्रेन (डोनबास और आसपास के क्षेत्र) अब एक 'फोर्टिफाइड ज़ोन' में तब्दील हो चुके हैं।
- रूस की रणनीति: रूसी सेना ने कब्जे वाले क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है और अब वे रक्षात्मक मोड में अधिक नज़र आ रहे हैं।
- यूक्रेन का पलटवार: पश्चिमी देशों से मिले अत्याधुनिक ड्रोन्स और लंबी दूरी की मिसाइलों के दम पर यूक्रेन अभी भी कड़ा प्रतिरोध कर रहा है। हालांकि, लंबे युद्ध ने यूक्रेनी संसाधनों पर भारी दबाव डाला है।
2. शांति वार्ता की आहट: कूटनीतिक गलियारों में हलचल
2026 की सबसे बड़ी खबर यह है कि पर्दे के पीछे शांति वार्ता (Peace Talks) की सुगबुगाहट तेज हुई है।
- मध्यस्थों की भूमिका: तुर्की, भारत और संयुक्त राष्ट्र (UN) लगातार दोनों पक्षों को एक मेज पर लाने का प्रयास कर रहे हैं।
- यूरोप का बदलता रुख: कुछ यूरोपीय देशों में 'युद्ध की थकान' (War Fatigue) दिखने लगी है, जिसके चलते वे अब युद्धविराम (Ceasefire) के लिए दबाव बना रहे हैं।
- पेच कहाँ फंसा है?: यूक्रेन अपनी पूरी जमीन वापस चाहता है, जबकि रूस अपनी सुरक्षा गारंटी और जीते हुए क्षेत्रों पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है।
3. वैश्विक प्रभाव: दुनिया पर पड़ रही दोहरी मार
यह युद्ध अब केवल दो देशों की सीमाओं के भीतर नहीं रहा, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के ढांचे को हिलाकर रख दिया है। — राजनीतिक विश्लेषक
A. आर्थिक और ऊर्जा संकट
- महंगाई का बोझ: वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में अस्थिरता के कारण विकासशील देशों में माल ढुलाई और खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं।
- यूरोप की चुनौती: रूसी गैस पर निर्भरता कम करने की कोशिश में यूरोप को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के लिए भारी निवेश करना पड़ रहा है।
B. 'प्लेट पर संकट': वैश्विक खाद्य सुरक्षा
रूस और यूक्रेन दुनिया के 'ब्रेड बास्केट' (अनाज का कटोरा) कहे जाते हैं। युद्ध के कारण:
- गेहूं और मक्का की सप्लाई चेन बाधित है।
- अफ्रीका और एशिया के गरीब देशों में भुखमरी का खतरा 2026 में और गहरा गया है।
4. नया 'शीत युद्ध' और नाटो (NATO)
इस युद्ध ने वैश्विक राजनीति को स्पष्ट रूप से दो ध्रुवों में बाँट दिया है।
- नाटो की मजबूती: नाटो ने रूस की सीमा से सटे देशों में अपनी सैन्य उपस्थिति दोगुनी कर दी है। फिनलैंड और स्वीडन के शामिल होने के बाद नाटो का रक्षा बजट 2026 में अपने ऐतिहासिक स्तर पर है।
- रूस के गठबंधन: रूस ने भी पश्चिमी प्रतिबंधों के जवाब में अपने सहयोगी देशों के साथ आर्थिक और सैन्य संबंध और गहरे कर लिए हैं।
5. मानवीय त्रासदी: आंकड़ों के पार का दर्द
युद्ध के मानवीय पक्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:
- विस्थापन: 2026 तक करोड़ों लोग अपने घरों से दूर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं।
- बुनियादी ढांचा: यूक्रेन के कई शहर खंडहरों में तब्दील हो चुके हैं, जिन्हें दोबारा बसाने में दशकों का समय और खरबों डॉलर लगेंगे।
निष्कर्ष: 2026 – कूटनीति बनाम विनाश
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 इस युद्ध के लिए 'मेक-ऑर-ब्रेक' (निर्णायक) साल है। या तो दोनों पक्ष आर्थिक और मानवीय बर्बादी को देखते हुए किसी 'सीमित समझौते' पर सहमत होंगे, या फिर यह संघर्ष एक अंतहीन 'फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट' का रूप ले लेगा जो आने वाली कई पीढ़ियों के भविष्य को अंधकार में डाल देगा।
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