महाराष्ट्र महा-संग्राम 2026: 29 महानगरपालिकाओं का रण, 15 जनवरी को तय होगा स्थानीय सत्ता का भविष्य

 

विशेष रिपोर्ट: मुंबई ब्यूरो 12 जनवरी 2026

महाराष्ट्र की राजनीति इस समय अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। चार वर्षों के लंबे इंतज़ार, दर्जनों कानूनी लड़ाइयों और सत्ता के बदलते समीकरणों के बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने 29 महानगरपालिकाओं के लिए चुनावी शंखनाद कर दिया है। 15 जनवरी 2026 को होने वाले इस मतदान को केवल 'स्थानीय चुनाव' कहना गलत होगा; वास्तव में यह महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज 'महायुति' और विपक्षी 'महाविकास अघाड़ी' के बीच वर्चस्व की अंतिम जंग है। इन चुनावों के नतीजे 16 जनवरी को घोषित किए जाएंगे, जो यह तय करेंगे कि राज्य की जनता का असली जनादेश किसके पक्ष में है।

चुनावी पृष्ठभूमि: चार साल का इंतज़ार और कानूनी गतिरोध

महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों का कार्यकाल 2020-2022 के बीच समाप्त हो गया था, लेकिन कोरोना महामारी, वार्ड परिसीमन (Delimitation) के विवाद और अन्य तकनीकी कारणों से इन्हें लगातार टाला जाता रहा। सबसे बड़ा विवाद 'ओबीसी आरक्षण' को लेकर था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां लंबी सुनवाई के बाद 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखने का ऐतिहासिक फैसला आया। इस फैसले के बाद वार्डों की सीमाओं में बड़े बदलाव किए गए, जिससे कई दिग्गज नेताओं के पारंपरिक वार्ड सुरक्षित नहीं रहे। यही कारण है कि इस बार का चुनाव नए चेहरों और बदली हुई रणनीतियों का गवाह बनने जा रहा है।

बीएमसी (BMC): देश की सबसे अमीर संस्था पर दांव

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) इन 29 निकायों में सबसे महत्वपूर्ण है। 74,000 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक बजट वाली इस संस्था पर पिछले तीन दशकों से अविभाजित शिवसेना का वर्चस्व रहा था। लेकिन शिवसेना के दो फाड़ होने के बाद यह पहली बार है जब उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे सीधे चुनावी मैदान में आमने-सामने होंगे। बीजेपी ने 'मिशन मुंबई' के तहत बीएमसी पर अपना भगवा लहराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। मुंबई के 227 वार्डों के लिए इस बार रिकॉर्ड संख्या में उम्मीदवार मैदान में हैं। प्रशासन ने मुंबई में 10,231 मतदान केंद्र बनाए हैं, ताकि मतदाता आसानी से अपना वोट डाल सकें।

राजनीतिक समीकरण: गठबंधन की नई बिसात

महाराष्ट्र की राजनीति में इस बार गठबंधनों का स्वरूप काफी जटिल है। सत्ता पक्ष में 'महायुति' (बीजेपी, शिंदे की शिवसेना और अजीत पवार की एनसीपी) एक साथ है, लेकिन स्थानीय स्तर पर सीटों के बंटवारे को लेकर कई जगहों पर असंतोष देखा जा रहा है। ठाणे और कल्याण-डोंबिवली जैसे क्षेत्रों में शिंदे गुट और बीजेपी के बीच 'फ्रेंडली फाइट' की स्थिति बनी हुई है।

दूसरी ओर, महाविकास अघाड़ी (एमवीए) में भी दरारें साफ दिख रही हैं। कांग्रेस ने बीएमसी चुनावों में अकेले उतरने का साहसिक फैसला लिया है, जिसका सीधा असर विपक्षी वोटों के बंटवारे पर पड़ सकता है। हालांकि, सबसे ज्यादा चर्चा उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच संभावित 'परदे के पीछे' के गठबंधन की है। 20 साल बाद दोनों भाइयों के समर्थकों में एक साथ आने की उम्मीद जगी है, जो 'मराठी कार्ड' के जरिए महायुति के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।

वोटर लिस्ट विवाद और तकनीकी चुनौतियां

चुनाव से ठीक पहले मुंबई की मतदाता सूची ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि संशोधित सूची में 11 लाख से अधिक 'डुप्लीकेट' नाम शामिल हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि तकनीक का सहारा लेकर इन त्रुटियों को सुधारा जा रहा है, लेकिन राजनीतिक दलों ने इसे चुनावी धांधली की कोशिश बताया है। इसके अलावा, चुनाव आयोग ने इस बार उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दिया है, जिससे चुनावी मैदान में मुकाबला और भी महंगा और कड़ा हो गया है।

प्रमुख महानगरपालिकाओं का हाल

मुंबई के अलावा ठाणे, पुणे, नागपुर और नाशिक जैसी महानगरपालिकाओं पर भी सबकी निगाहें टिकी हैं।

  1. ठाणे: यह मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का अपना गढ़ है। यहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने शिंदे को चुनौती देने के लिए आक्रामक प्रचार किया है।
  2. पुणे और पिंपरी-चिंचवड: यहां बीजेपी और अजीत पवार के बीच वर्चस्व की लड़ाई है। पुणे में विकास कार्यों और ट्रैफिक की समस्या को मुख्य मुद्दा बनाया गया है।
  3. नागपुर: आरएसएस के मुख्यालय वाले इस शहर में बीजेपी का पलड़ा भारी दिख रहा है, लेकिन कांग्रेस ने यहां स्थानीय स्तर पर मजबूत घेराबंदी की है।
  4. छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): नाम परिवर्तन के मुद्दे के बाद यहां पहली बार चुनाव हो रहे हैं, जहां ध्रुवीकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

छोटे दलों की भूमिका: 'किंगमेकर' की तलाश

रामदास आठवले की आरपीआई (A) ने बीएमसी में 18-20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इसी तरह प्रकाश अंबेडकर की 'वंचित बहुजन अघाड़ी' और राज ठाकरे की मनसे कई महत्वपूर्ण सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। ये छोटे दल उन वार्डों में बड़े दलों का खेल बिगाड़ सकते हैं जहां जीत का अंतर बहुत कम रहता है।

मुद्दे जो वोटरों को प्रभावित करेंगे

इस चुनाव में स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राज्य स्तर के भावनात्मक मुद्दों का भी मिश्रण है।

  1. मराठा आरक्षण: मनोज जरांगे पाटिल के नेतृत्व में हुए आंदोलनों का असर ग्रामीण और अर्ध-शहरी निकायों पर पड़ना तय है।
  2. विकास बनाम भ्रष्टाचार: महायुति सरकार 'डबल इंजन' की सरकार के फायदों को गिना रही है, जबकि विपक्ष बीएमसी और अन्य निकायों में भ्रष्टाचार और प्रशासक राज के दौरान लिए गए फैसलों पर सवाल उठा रहा है।
  3. बुनियादी ढांचा: कोस्टल रोड, मेट्रो प्रोजेक्ट्स और खराब सड़कों का मुद्दा शहरी मतदाताओं के लिए सर्वोपरि है।

निष्कर्ष: 2026 विधानसभा चुनाव का 'ट्रेलर'

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इन 29 महानगरपालिकाओं के नतीजे यह तय करेंगे कि आगामी विधानसभा चुनाव में किसका पलड़ा भारी रहेगा। यदि महायुति बीएमसी और पुणे जैसी प्रमुख निकायों को जीतने में सफल रहती है, तो यह उनके नेतृत्व की बड़ी जीत होगी। वहीं, यदि एमवीए और विशेषकर उद्धव ठाकरे मुंबई को बचाने में कामयाब होते हैं, तो यह उनके लिए एक राजनीतिक पुनर्जन्म जैसा होगा।

15 जनवरी को होने वाला मतदान केवल वार्डों के प्रतिनिधि चुनने के लिए नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की अस्मिता, विकास और राजनीतिक दिशा को परिभाषित करने वाला क्षण है। 16 जनवरी की दोपहर तक यह स्पष्ट हो जाएगा कि 'महाराष्ट्र का रिमोट कंट्रोल' किसके हाथ में होगा।

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