सियासत के तीन मशहूर ‘निकनेम’: कोई ‘अंधभक्त’, कोई ‘चमचा’, तो कोई ‘टोंटी चोर’—आखिर ये नाम आए कहां से?

 

विशेष व्यंग्यात्मक राजनीतिक रिपोर्ट: भारतीय राजनीति में चुनाव सिर्फ EVM पर नहीं लड़े जाते, एक अलग चुनाव सोशल मीडिया पर रोज चलता है। यहां घोषणा-पत्र से ज्यादा मीम वायरल होते हैं, भाषण से ज्यादा कमेंट और नेताओं के असली नामों से ज्यादा उनके समर्थकों को दिए गए राजनीतिक ‘निकनेम’ सुनाई देते हैं।

इसी डिजिटल राजनीति की शब्दावली में अक्सर तीन तंज सुनाई देते हैं—BJP समर्थकों के लिए ‘अंधभक्त’, कांग्रेस समर्थकों के लिए ‘चमचा’ और समाजवादी पार्टी के समर्थकों या पार्टी पर तंज कसने के लिए ‘टोंटी चोर’।

मगर सवाल है—ये शब्द आए कहां से और राजनीति में इतने लोकप्रिय कैसे हो गए?

BJP समर्थकों को ‘अंधभक्त’ क्यों कहा जाता है?

‘भक्त’ शब्द का वास्तविक अर्थ श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति है और भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा में यह सम्मानजनक शब्द है। लेकिन राजनीतिक सोशल मीडिया ने इसके आगे ‘अंध’ लगाकर इसका बिल्कुल अलग व्यंग्यात्मक अर्थ बना दिया।

BJP और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुछ अत्यंत उत्साही समर्थकों पर विरोधी आरोप लगाते रहे हैं कि वे सरकार या नेतृत्व के लगभग हर फैसले का समर्थन करते हैं और आलोचना स्वीकार नहीं करते। इसी आरोप से सोशल मीडिया पर ‘अंधभक्त’ शब्द लोकप्रिय हुआ।

अब इंटरनेट का गणित देखिए—

सरकार की तारीफ की?

“अंधभक्त!”

किसी सरकारी योजना को अच्छा बताया?

“भक्त आ गया!”

मोदी की फोटो DP पर लगा ली?

सोशल मीडिया अदालत में फैसला आने में शायद तीन सेकंड लगें।

मगर इसमें एक समस्या है। हर BJP समर्थक सरकार के हर फैसले का आंख बंद करके समर्थन करता हो, ऐसा मान लेना उतना ही गलत है जितना यह मान लेना कि किसी दूसरी पार्टी का प्रत्येक समर्थक उसके नेतृत्व की आलोचना नहीं करता।

यानी ‘अंधभक्त’ कोई आधिकारिक राजनीतिक श्रेणी नहीं बल्कि विरोधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तंज है।

कांग्रेस समर्थकों को ‘चमचा’ क्यों कहा जाता है?

अब राजनीति की टाइम मशीन थोड़ी पीछे घुमाइए।

‘चमचा’ शब्द भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया से बहुत पुराना है। इसका इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति के लिए व्यंग्य में होता रहा है जिसे किसी बड़े नेता की अत्यधिक खुशामद करने वाला माना जाए।

कांग्रेस के मामले में विरोधी लंबे समय से गांधी-नेहरू परिवार के प्रभाव और नेतृत्व के प्रति वफादारी को लेकर पार्टी पर हमला करते रहे हैं। इसी राजनीतिक आलोचना से कांग्रेस नेताओं और समर्थकों के लिए ‘चमचा’ या कभी-कभी ‘दरबारी’ जैसे शब्द इस्तेमाल होने लगे।

सोशल मीडिया ने इसे भी आसान फॉर्मूला बना दिया—

राहुल गांधी की तारीफ?

“चमचा!”

कांग्रेस की किसी नीति का समर्थन?

“दरबारी!”

लेकिन यहां भी वही समस्या है जो ‘अंधभक्त’ वाले मामले में है। किसी पार्टी का समर्थक होना और किसी नेता की चापलूसी करना दो अलग बातें हैं।

लोकतंत्र में कोई नागरिक BJP, कांग्रेस, SP या किसी अन्य दल का समर्थक हो सकता है और फिर भी अपनी ही पार्टी के फैसलों से असहमति रख सकता है।

और समाजवादी पार्टी के साथ ‘टोंटी चोर’ कैसे जुड़ा?

इन तीनों में सबसे दिलचस्प राजनीतिक कहानी शायद ‘टोंटी’ वाली है।

2018 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा सरकारी मुख्यमंत्री आवास खाली किए जाने के बाद बंगले की स्थिति को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था। मीडिया रिपोर्टों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में नल और अन्य फिटिंग्स गायब होने की बातें सामने आईं।

इसके बाद विरोधियों ने अखिलेश यादव को निशाना बनाते हुए ‘टोंटी चोर’ जैसा तंज इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। विवाद इतना चर्चित हुआ कि ‘टोंटी’ उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बयानबाजी और मीम संस्कृति का हिस्सा बन गई।

हालांकि इसे तथ्यात्मक रूप से यह कहकर प्रस्तुत करना कि चोरी साबित हो गई थी, सही नहीं होगा। यह मुख्यतः राजनीतिक आरोप और उससे पैदा हुआ व्यंग्यात्मक उपनाम था।

फिर इंटरनेट ने वही किया जिसमें इंटरनेट माहिर है—एक विवाद को वर्षों तक जीवित रखने वाला मीम बना दिया।

समाजवादी पार्टी की पोस्ट आई नहीं कि कमेंट बॉक्स में किसी न किसी को टोंटी याद आ जाती है।

राजनीतिक स्मृति कमजोर हो सकती है, लेकिन मीम की मेमोरी शायद हाथी से भी तेज है!

राजनीति कम, ‘फैन क्लब’ ज्यादा?

इन तीन शब्दों की लोकप्रियता एक बड़ी कहानी बताती है।

भारत में राजनीतिक दलों के समर्थकों का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर कभी-कभी क्रिकेट टीम के प्रशंसकों जैसा व्यवहार करता दिखाई देता है।

अपनी पार्टी ने अच्छा किया—

“ऐतिहासिक फैसला!”

विरोधी पार्टी ने वही किया—

“लोकतंत्र खतरे में है!”

अपना नेता बयान बदले—

“परिस्थिति के अनुसार रणनीति।”

विरोधी नेता बयान बदले—

“देखिए यू-टर्न!”

यानी राजनीति का नया कैलकुलेटर कभी-कभी ऐसा चलता है कि उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि सवाल किस पार्टी से पूछा गया है।

तीन पार्टियां, तीन तंज—फॉर्मूला लगभग एक

दिलचस्प बात यह है कि ‘अंधभक्त’, ‘चमचा’ और ‘टोंटी चोर’ विचारधारा की दृष्टि से एक जैसे शब्द नहीं हैं।

‘अंधभक्त’ कथित अंधसमर्थन पर हमला है।

‘चमचा’ कथित खुशामद या नेतृत्व के प्रति अत्यधिक वफादारी पर तंज है।

जबकि ‘टोंटी चोर’ एक खास राजनीतिक विवाद से पैदा हुआ उपनाम है।

लेकिन सोशल मीडिया पर तीनों का इस्तेमाल लगभग एक ही हथियार की तरह होता है—सामने वाले की राजनीतिक पहचान का मजाक उड़ाओ और बहस शुरू होने से पहले ही उसे एक खांचे में डाल दो।

सोशल मीडिया की राजनीतिक संसद

पहले राजनीतिक बहस चाय की दुकान पर होती थी।

अब चाय ठंडी होने से पहले WhatsApp पर 14 वीडियो, Facebook पर 20 पोस्ट और X पर 200 प्रतिक्रियाएं आ चुकी होती हैं।

एक पक्ष कहता है—“तुम अंधभक्त हो।”

दूसरा जवाब देता है—“पहले अपने चमचों को देखो।”

तीसरा आता है—“टोंटी कौन ले गया था?”

और असली मुद्दा कोने में बैठा सोच रहा होता है—

“मेरी चर्चा भी होनी थी शायद?”

यही राजनीतिक सोशल मीडिया का सबसे बड़ा व्यंग्य है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, सड़क, बिजली, पानी और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे जटिल हैं। उन पर आंकड़ों और तथ्यों के साथ चर्चा करने में मेहनत लगती है।

लेकिन किसी को ‘अंधभक्त’ या ‘चमचा’ लिखने में पांच सेकंड लगते हैं।

क्या ऐसे शब्द लोकतांत्रिक बहस को नुकसान पहुंचाते हैं?

हंसी-मजाक और राजनीतिक व्यंग्य लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। नेताओं और सरकारों पर व्यंग्य किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति में असामान्य नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब लेबल तर्क की जगह ले लेता है।

अगर किसी व्यक्ति ने BJP की किसी नीति का समर्थन किया तो इससे अपने-आप यह साबित नहीं होता कि वह ‘अंधभक्त’ है। कांग्रेस की किसी बात का समर्थन करने वाला हर व्यक्ति ‘चमचा’ नहीं होता। इसी तरह SP के प्रत्येक समर्थक को किसी पुराने बंगला विवाद के आधार पर ‘टोंटी चोर’ कहना तथ्यात्मक राजनीतिक आलोचना नहीं है।

मतदाता एक ही समय में किसी सरकार के एक फैसले का समर्थन और दूसरे का विरोध कर सकता है। यही लोकतांत्रिक सोच की खूबसूरती है।

निष्कर्ष: नेता बदलते हैं, मीम अमर रहते हैं!

भारतीय राजनीति में सरकारें आती-जाती हैं, गठबंधन बनते-बिगड़ते हैं, नेता दल बदलते हैं और चुनावी मुद्दे बदल जाते हैं—लेकिन सोशल मीडिया के राजनीतिक निकनेम बड़ी आसानी से खत्म नहीं होते।

‘अंधभक्त’, ‘चमचा’ और ‘टोंटी चोर’ इसी राजनीतिक मीम संस्कृति की अलग-अलग पैदाइश हैं।

इन पर हंसा जा सकता है, इनके इतिहास को समझा जा सकता है और राजनीतिक व्यंग्य भी किया जा सकता है। लेकिन किसी करोड़ों लोगों वाले राजनीतिक समूह को एक अपमानजनक शब्द में समेट देना वास्तविकता को जरूरत से ज्यादा सरल बना देता है।

लोकतंत्र का मजा तब है जब जनता नेता की समर्थक जरूर हो, लेकिन सवाल पूछने की आदत न छोड़े—क्योंकि जिस दिन सवाल खत्म हो गए, उस दिन ‘भक्त’, ‘चमचा’ और ‘टोंटी’ की बहस तो बचेगी, मुद्दे शायद गायब हो जाएंगे।

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