कानूनी जानकारों के अनुसार, भारत में बिना सहमति किसी की निजी सामग्री साझा करना आईटी एक्ट और भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध है। इसमें कड़ी सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद, पीड़ित अक्सर शर्म, डर या सामाजिक दबाव के कारण शिकायत दर्ज कराने से हिचकते हैं, जिससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार फर्जी “लिंक” या “वायरल” शीर्षक का इस्तेमाल कर यूज़र्स को ठगा जाता है। इन लिंक पर क्लिक करते ही अकाउंट हैक हो सकता है या निजी डेटा चोरी हो सकता है। ऐसे मामलों में असली पीड़ित के बजाय अफवाहें और गलत जानकारी फैलती हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ती है।
Instagram सहित प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने रिपोर्टिंग टूल्स, कंटेंट टेक-डाउन और अकाउंट सस्पेंशन जैसी व्यवस्थाएँ लागू की हैं। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल प्लेटफॉर्म की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है; यूज़र जागरूकता सबसे अहम है। मजबूत पासवर्ड, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, प्राइवेसी सेटिंग्स और संदिग्ध लिंक से दूरी—ये सभी बुनियादी सुरक्षा कदम हैं।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वायरल घटनाओं का शिकार बनने वालों को समर्थन और काउंसलिंग की आवश्यकता होती है, न कि दोषारोपण की। समाज में पीड़ित-दोषी की मानसिकता छोड़कर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
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