Education News | भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार: भविष्य की नींव को मज़बूत करने की ज़रूरत

 

नई दिल्ली।
भारत की शिक्षा प्रणाली लंबे समय से सुधार की मांग कर रही है। बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीकी प्रगति और युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं के बीच यह ज़रूरी हो गया है कि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित न रहे, बल्कि कौशल, नवाचार और समग्र विकास पर केंद्रित हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही समय पर ठोस सुधार किए जाएँ, तो भारत की शिक्षा प्रणाली देश को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बना सकती है।

सबसे पहला सुधार रटंत प्रणाली से मुक्ति को लेकर आवश्यक है। वर्तमान में कई स्कूलों और कॉलेजों में अंक और परीक्षा को ही सफलता का पैमाना माना जाता है। इससे विद्यार्थियों की रचनात्मकता और तार्किक सोच दब जाती है। शिक्षा विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि मूल्यांकन प्रणाली को प्रोजेक्ट, प्रेज़ेंटेशन, समूह कार्य और व्यवहारिक ज्ञान पर आधारित किया जाना चाहिए, ताकि छात्रों की वास्तविक समझ विकसित हो सके।

दूसरा बड़ा मुद्दा शिक्षा और कौशल के बीच की खाई है। आज भी बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के लिए तैयार नहीं होते। उद्योग जगत की मांग और पाठ्यक्रम के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई देती है। ऐसे में स्कूल और कॉलेज स्तर से ही स्किल-बेस्ड एजुकेशन, इंटर्नशिप और व्यावहारिक प्रशिक्षण को अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिससे युवा आत्मनिर्भर बन सकें।

शिक्षकों की गुणवत्ता और प्रशिक्षण भी सुधार का अहम क्षेत्र है। कई सरकारी और निजी संस्थानों में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी देखी जाती है। नियमित ट्रेनिंग, आधुनिक शिक्षण तकनीकों का ज्ञान और डिजिटल टूल्स का उपयोग शिक्षकों को और प्रभावी बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब शिक्षक सशक्त होंगे, तभी छात्र बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे।

डिजिटल युग में तकनीक का समुचित उपयोग शिक्षा प्रणाली को नया आयाम दे सकता है। ऑनलाइन क्लास, डिजिटल लाइब्रेरी, वर्चुअल लैब और -लर्निंग प्लेटफॉर्म से ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों के छात्रों को भी समान अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, इसके साथ-साथ डिजिटल डिवाइड को कम करना भी उतना ही ज़रूरी है, ताकि हर छात्र तक तकनीक की पहुँच सुनिश्चित हो सके।

मानसिक स्वास्थ्य और करियर मार्गदर्शन को भी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण छात्रों में तनाव, अवसाद और भ्रम की स्थिति देखी जा रही है। स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग और करियर गाइडेंस की सुविधा छात्रों को सही दिशा देने में मदद कर सकती है।

भाषा और स्थानीय संदर्भ पर आधारित शिक्षा भी एक महत्वपूर्ण सुधार हो सकता है। प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई से बच्चों की समझ बेहतर होती है। साथ ही, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और नागरिक जिम्मेदारियों को पाठ्यक्रम में शामिल करने से समग्र विकास संभव है।

निष्कर्षतः, भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार केवल नीतियों से नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन से संभव है। यदि शिक्षा को रोजगारोन्मुख, तकनीक-सक्षम और छात्र-केंद्रित बनाया जाए, तो आने वाला समय भारत के लिए ज्ञान और नवाचार का स्वर्णिम युग साबित हो सकता है।

 

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