रोहिंग्या-बांग्लादेशी नेटवर्क का खुलासा: सीमापार छोटे व्यापार की आड़ में तस्करी और अवैध गतिविधियाँ

 

रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोगों की सीमापार गतिविधियाँ : तस्करी से लेकर छोटे व्यापार तक — नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय और भारत-बांग्लादेश सन्दर्भ

भारत-बांग्लादेश सीमा और बांग्लादेश के भीतर रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोगों की गतिविधियाँ लगातार सुर्ख़ियाँ बनी हुई हैं, जिनमें सीमापार तस्करी, मानव तस्करी के प्रयास, छोटे व्यापार और पुलिस/बीएसएफ कार्रवाइयाँ प्रमुख हैं। इन घटनाओं ने न केवल मानवाधिकार और सीमा-सुरक्षा के मुद्दों को चुनौती दी है, बल्कि यह दिखाया है कि कैसे आर्थिक कठिनाइयाँ और नीति-गत सीमाएँ स्थानीय स्तर पर रोज़गार और जीवनयापन को प्रभावित कर रही हैं।

सबसे ताज़ा घटनाओं में, **28 दिसंबर 2024 को बांग्लादेशी पुलिस ने टेकनाफ (Teknaf) में एक मानव तस्करी रैकेट को पकड़ा और 61 रोहिंग्या तथा 5 बांग्लादेशी नागरिकों को मलयेशिया भेजने के प्रयास से बचाया। इस ऑपरेशन में पाँच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया — जिनमें Md Rashid, Saleh Ahmed और Kamrul Islam जैसी पहचान शामिल हैं। बचाई गई 66 व्यक्तियों में 37 बच्चे भी थे, जो समुद्री मार्ग से ले जाया जा रहे थे। यह कार्रवाई बताती है कि रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोग अक्सर बेहतर जीवन और रोजगार के लिए जोखिम भरे तस्करी नेटवर्कों का शिकार हो जाते हैं। 

सीमापार तस्करी केवल माल तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को भी अवैध रूप से घुसाने के प्रयास लगातार जारी हैं। भारत की सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने 2025 में त्रिपुरा फ्रंटियर पर ₹46 करोड़ से अधिक मूल्य की मादक पदार्थ तस्करी उजागर की, जिसमें हजारों याबा टैबलेट और गांजा के बड़े गोदाम पाए गए। इस अभियान में लगभग 675 लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें 55 रोहिंग्या, 620 बांग्लादेशी और 260 भारतीय नागरिक शामिल थे। यह स्पष्ट करता है कि सीमापार तस्करी में न केवल ड्रग्स शामिल हैं, बल्कि मानव तस्करी से जुड़े नेटवर्क भी सक्रिय हैं। 

सीमापार गतिविधियाँ नए रूप भी ले रही हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार कुछ रोहिंग्या शरणार्थी मोबाइल बैंकिंग सेवाओं का उपयोग करके अवैध लेन-देने में भी शामिल हैं, जैसे कि फोन शॉप खोलना और सिम/फोन की बिक्री करना। कुछ शिविरों में इस तरह के छोटे मोबाइल फोन रिपेयर और बिक्री केंद्र भी चल रहे हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियाँ धीरे-धीरे उभर रही हैं — लेकिन यह अवैध तस्करी और पंजीकृत कानूनी छोटे व्यापार के बीच एक धुंधली सीमा बनाता है। 

बीएसएफ की रोक-थाम कार्रवाई केवल सीमापार तस्करी तक ही सीमित नहीं है। सीमा पर लगातार रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध प्रवेश के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा है — उदाहरण के लिए असम के कछार ज़िले में 9 रोहिंग्या लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस प्रकार के मामलों में अक्सर यह देखा जाता है कि लोग बेहतर अवसरों की तलाश में सीमा पार करते हैं, जबकि कानून-व्यवस्था और मानवीय चिंताओं के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता जा रहा है। 

बांग्लादेश के अपने भीतर संघर्ष भी जारी हैं। सरकार ने कभी कहा है कि वह नए रोहिंग्या आगमन को रोकना चाहती है, लेकिन सीमा पर भ्रष्टाचार और ब्रोकरों द्वारा हर व्यक्ति से उच्च शुल्क लेकर लोगों को अवैध रूप से देश में प्रवेश कराने की कोशिशें भी जारी हैं, जिसमें कुछ ब्रोकर Tk 20,000 से Tk 30,000 प्रति व्यक्ति चार्ज करते हैं। 

अर्थव्यवस्था और सहायता कटौती की वजह से रोहिंग्या शिविरों में संकट बढ़ रहा है। विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) की सहायता में कमी के कारण राशन में कटौती से लोग बाहर जाकर कमाई के प्रयास में अपराधों की ओर भी आकर्षित हो सकते हैं, जिससे चोरी, तस्करी और छोटे-स्तर की गैरकानूनी गतिविधियों में वृद्धि की आशंका है। 

इन सभी घटनाओं का मेल यह दर्शाता है कि रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोगों की सीमापार गतिविधियाँ सिर्फ़ “व्यापार” नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरा सामाजिक और आर्थिक मुद्दा है — जिसमें मानव तस्करी, ड्रग तस्करी, सीमापार अवैध प्रवेश और अब छोटे आर्थिक व्यापार (जैसे मोबाइल सेवाएँ) भी शामिल हो रहे हैं। सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए यह चुनौती है कि वे मानवाधिकारों, सुरक्षा उपायों और आर्थिक सहायता के बीच संतुलन बनाए रखें ताकि स्थानीय समुदायों और शरणार्थियों दोनों के लिए स्थिर और सुरक्षित जीवन सुनिश्चित किया जा सके।

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