डोनाल्ड ट्रम्प का कहना है कि ग्रीनलैंड न केवल रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि वहां से अमेरिका को ऊर्जा संसाधनों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ग्रीनलैंड के जरिए अमेरिका को वेनेज़ुएला के लाखों बैरल तेल तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि इस दावे को लेकर विशेषज्ञों में मतभेद है, लेकिन ट्रम्प का बयान अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा नीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में स्थित है और यह सामरिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। यह क्षेत्र नाटो की रणनीतिक योजना का भी हिस्सा रहा है। अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य और वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए मौजूद है, लेकिन इसे खरीदने या राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाने का विचार अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक मर्यादाओं को लेकर सवाल खड़े करता है।
ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा संसाधन और रूस-चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर तनाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड पर दोबारा दावा करना अमेरिका की उस नीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें वह आर्कटिक क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।
हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड प्रशासन की ओर से पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। डेनमार्क के अधिकारियों ने इसे ग्रीनलैंड की संप्रभुता और वहां के लोगों के अधिकारों से जुड़ा मामला बताया है। इससे पहले भी ट्रम्प के ऐसे बयान पर डेनमार्क और यूरोपीय देशों ने नाराज़गी जताई थी।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि ट्रम्प का यह बयान राजनीतिक दबाव बनाने और वैश्विक मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति भी हो सकता है। अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी इस बयान को आगामी राजनीतिक गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प का यह नया बयान एक बार फिर यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में भू-रणनीतिक क्षेत्रों का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य संतुलन और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को लेकर दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस बयान का कूटनीतिक स्तर पर क्या असर पड़ता है और वैश्विक शक्तियां इसे किस नजरिए से देखती हैं।
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