FIR में गलती से नाम आ जाए तो क्या जिंदगी भर माना जाएगा आरोपी? पासपोर्ट, पुलिस वेरिफिकेशन और चार्जशीट को लेकर जानिए अपने अधिकार

 

कानूनी जागरूकता विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली/मुंबई: 

किसी आपराधिक मामले की FIR में नाम जाना किसी भी व्यक्ति और उसके परिवार के लिए बेहद परेशान करने वाला अनुभव हो सकता है। परेशानी तब और बढ़ जाती है जब व्यक्ति का अपराध से कोई संबंध हो, शिकायतकर्ता बाद में खुद स्वीकार कर ले कि नाम गलती से लिखवा दिया गया था और पुलिस जांच में भी उस व्यक्ति के खिलाफ कोई सबूत मिले। इसके बावजूद इंटरनेट या पुलिस के पुराने रिकॉर्ड में FIR देखने पर उसका नाम दिखाई देता रहे, तो नौकरी, पासपोर्ट और विदेश जाने को लेकर डर पैदा होना स्वाभाविक है।

लेकिन कानून में FIR में नाम होना, पुलिस द्वारा आरोपी मानना, चार्जशीट में आरोपी बनाया जाना और अदालत द्वारा दोषी ठहराया जानाचार अलग-अलग स्थितियां हैं। सिर्फ FIR में नाम दर्ज होने से कोई व्यक्ति अपराधी साबित नहीं हो जाता।

FIR में नाम का मतलब दोष सिद्ध होना नहीं

FIR यानी First Information Report किसी संज्ञेय अपराध के संबंध में पुलिस को प्राप्त शुरुआती सूचना का रिकॉर्ड होती है। FIR में किसी व्यक्ति का नाम आरोपी के रूप में लिखे जाने के बाद पुलिस उस आरोप की जांच करती है।

जांच में पुलिस गवाहों के बयान, दस्तावेज, CCTV, मेडिकल या फोरेंसिक साक्ष्य और अन्य परिस्थितियों को देख सकती है। जांच के बाद शुरुआती आरोप सही भी निकल सकता है और गलत भी।

यही वजह है कि FIR में किसी का नाम देखकर उसे सीधेअपराधीकहना कानूनी दृष्टि से सही नहीं है। दोषसिद्धि का निर्णय सक्षम अदालत करती है।

शिकायतकर्ता कह दे कि नाम गलती से लिखवाया था तो क्या होगा?

मान लीजिए किसी घटना के बाद शिकायतकर्ता ने FIR में A, B और C का नाम लिखवा दिया। बाद में जांच के दौरान शिकायतकर्ता पुलिस को बयान देता है कि C घटना में शामिल ही नहीं था और उसका नाम गलतफहमी या गलती से लिखवा दिया गया था।

ऐसी स्थिति में पुलिस केवल मूल FIR तक सीमित नहीं रहती। उसे जांच के दौरान सामने आई सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई करनी होती है।

अगर जांच में भी C की संलिप्तता का कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिलता और पुलिस उसे मुकदमा चलाने के लिए आरोपी के रूप में चार्जशीट नहीं करती, तो उसकी स्थिति FIR में नाम होने वाले उस व्यक्ति से अलग होगी जिसके खिलाफ पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया है।

हालांकि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और अंतिम कानूनी स्थिति चार्जशीट, पुलिस की अंतिम रिपोर्ट तथा अदालत के रिकॉर्ड से ही निश्चित की जानी चाहिए।

चार्जशीट क्यों है महत्वपूर्ण?

कई लोगों में गलत धारणा है कि FIR में नाम गया तो चार्जशीट में भी नाम जरूर रहेगा। ऐसा आवश्यक नहीं है।

FIR जांच की शुरुआत है, जबकि चार्जशीट जांच के बाद पुलिस द्वारा अदालत के सामने प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट है। इसलिए किसी व्यक्ति के बारे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद उसे किस स्थिति में रखा।

अगर चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और संबंधित व्यक्ति को charge-sheeted accused के रूप में नहीं भेजा गया है, तो यह उसके पक्ष में एक महत्वपूर्ण तथ्य हो सकता है।

फिर भी केवल किसी के मौखिक रूप से यह कह देने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए किचार्जशीट से नाम हट गया है।जरूरत पड़ने पर अदालत से चार्जशीट/संबंधित आदेश की प्रमाणित प्रति लेकर वास्तविक स्थिति की पुष्टि की जा सकती है।

ऑनलाइन FIR में नाम अभी भी क्यों दिखाई देता है?

यही बात बहुत से लोगों को भ्रमित करती है।

FIR घटना के समय दर्ज किया गया मूल रिकॉर्ड है। बाद में जांच में किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप गलत पाए जाने का अर्थ यह आवश्यक नहीं कि वेबसाइट पर उपलब्ध मूल FIR को दोबारा लिखकर उसमें से उसका नाम मिटा दिया जाए।

इसलिए संभव है कि पुलिस जांच में व्यक्ति को आरोपी बनाए, लेकिन ऑनलाइन उपलब्ध मूल FIR में उसका पुराना नाम दिखाई देता रहे।

ऑनलाइन FIR में नाम दिखाई देना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति आज भी उस मामले में charge-sheeted accused है या उसके खिलाफ मुकदमा लंबित है।

पासपोर्ट बनवाते समय क्या होगा?

ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा चिंता पासपोर्ट को लेकर होती है। विदेश में पढ़ाई, नौकरी या यात्रा की तैयारी कर रहे व्यक्ति को डर रहता है कि पुरानी FIR सामने आने से पासपोर्ट रुक जाएगा।

विदेश मंत्रालय के Passport Seva संबंधी आधिकारिक निर्देश इस विषय में महत्वपूर्ण अंतर बताते हैं। मंत्रालय के एक आधिकारिक circular के अनुसार केवल FIR दर्ज होना या मामला police investigation में होना अपने-आप Passports Act की धारा 6(2)(f) के तहत अदालत में लंबित criminal proceedings नहीं माना जाता। Criminal proceedings को इस संदर्भ में pending तब माना जाता है जब मामला अदालत में दर्ज हो और अदालत ने उसका cognizance लिया हो।

Passport Seva भी criminal court में pending मामलों को अलग श्रेणी में रखता है। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ वास्तव में किसी criminal court में मामला लंबित है, तो पासपोर्ट जारी करने के लिए संबंधित अदालत की लिखित अनुमति की आवश्यकता पड़ सकती है।

इसलिए सिर्फ यह कहना किचार साल पहले FIR में मेरा नाम थापूरी कानूनी स्थिति नहीं बताता। असली सवाल हैआज उस व्यक्ति के खिलाफ किसी criminal court में proceedings pending हैं या नहीं?

Police Verification में पुरानी FIR सामने जाए तो?

पासपोर्ट के लिए पुलिस वेरिफिकेशन महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। Passport Seva के अनुसार पुलिस वेरिफिकेशन का उद्देश्य आवेदक द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि करना है और अधिकांश सामान्य मामलों में पुलिस वेरिफिकेशन की आवश्यकता पड़ती है।

पुरानी FIR पुलिस रिकॉर्ड में मिलने पर अधिकारी उसकी वर्तमान स्थिति की जांच कर सकते हैं।

यदि किसी कारण से पहली Police Verification Report “Adverse” आती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि हर स्थिति में पासपोर्ट का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया। Passport Seva के अनुसार आवेदक संबंधित Passport Office से adverse report का कारण जान सकता है और स्पष्टीकरण के बाद आवश्यकता होने पर re-verification मांगी जा सकती है। Clear police report मिलने पर आवेदन आगे process किया जा सकता है।

अगर घटना के समय व्यक्ति नाबालिग था तो?

यदि FIR में नाम आने के समय व्यक्ति 18 वर्ष से कम उम्र का था, तो Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 के प्रावधान भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इस कानून की धारा 24 बच्चों के मामलों में conviction से जुड़ी disqualification हटाने की विशेष सुरक्षा देती है, हालांकि कानून में कुछ गंभीर मामलों के लिए अपवाद भी हैं।

लेकिन हर नाबालिग से जुड़े पुराने FIR मामले में धारा 24 स्वतः उसी तरीके से लागू होगी, ऐसा मान लेना भी सही नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि Juvenile Justice Board या Children’s Court में मामला किस स्तर तक गया और उसका परिणाम क्या रहा।

पासपोर्ट फॉर्म में जानकारी छिपाने की गलती करें

कई लोग पुरानी FIR देखकर डर जाते हैं और सोचते हैं कि आवेदन में कुछ जानकारी छिपा देना बेहतर होगा। यह रास्ता नुकसानदायक हो सकता है।

Passport application में criminal proceedings, court case, warrant, summons आदि से संबंधित प्रश्नों को ध्यान से पढ़ना चाहिए और ठीक वही जानकारी देनी चाहिए जो प्रश्न में मांगी गई है और जो वर्तमान कानूनी स्थिति है।

यदि समझ नहीं रहा कि किसी सवाल का उत्तर “Yes” होगा या “No”, तो अनुमान लगाने के बजाय Passport Seva/Passport Office या योग्य वकील से अपने दस्तावेज दिखाकर स्थिति स्पष्ट कर लेना बेहतर है।

ऐसे व्यक्ति को क्या करना चाहिए?

यदि किसी व्यक्ति का नाम गलती से FIR में आया था और बाद में पुलिस जांच में उसे आरोपी नहीं बनाया गया, तो भविष्य में परेशानी से बचने के लिए कुछ रिकॉर्ड सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता हैजैसे FIR की प्रति, शिकायतकर्ता के सुधारात्मक/बाद के बयान का उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड, चार्जशीट या final report का संबंधित हिस्सा, और अदालत का ऐसा कोई आदेश जो उसकी स्थिति स्पष्ट करता हो।

विशेष रूप से पासपोर्ट या विदेश यात्रा जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना बेहतर है कि किसी अदालत में उसके खिलाफ कोई आपराधिक proceeding, warrant, summons या विदेश जाने पर रोक का आदेश लंबित तो नहीं है।

एक FIR किसी को अपने-आप अपराधी नहीं बनाती

इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही हैFIR आरोप की शुरुआत हो सकती है, दोषसिद्धि नहीं।

किसी व्यक्ति का नाम गलती से FIR में सकता है। जांच के दौरान शिकायतकर्ता अपना तथ्यात्मक बयान स्पष्ट कर सकता है। पुलिस को नए तथ्य और साक्ष्य मिल सकते हैं और जांच के परिणाम में वह व्यक्ति charge-sheeted accused नहीं भी हो सकता है।

ऐसे व्यक्ति को केवल इंटरनेट पर दिखाई दे रही वर्षों पुरानी FIR के आधार परगुनहगारमान लेना उचित नहीं है।

साथ ही प्रभावित व्यक्ति को भी केवल मौखिक आश्वासन पर निर्भर रहने के बजाय अपने मामले की वर्तमान आधिकारिक स्थिति समझनी चाहिए। खास तौर पर पासपोर्ट के मामले में यह पता करना जरूरी है कि किसी criminal court में उसके खिलाफ proceedings वास्तव में लंबित हैं या नहीं।

जनहित संदेश: अगर आपका या आपके परिवार के किसी सदस्य का नाम किसी FIR में गलत तरीके से गया था, घबराकर भविष्य की पढ़ाई, नौकरी, पासपोर्ट या विदेश यात्रा छोड़ने का फैसला करें। पहले FIR के बाद हुई पुलिस जांच, चार्जशीट/फाइनल रिपोर्ट और अदालत की मौजूदा स्थिति की पुष्टि करें। आवश्यकता पड़ने पर योग्य अधिवक्ता से दस्तावेजों की जांच कराएं। कानून में “FIR में नामऔरदोषी व्यक्तिएक ही बात नहीं हैं।

 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ