नई दिल्ली / ढाका / इस्लामाबाद: दक्षिण एशिया की भू-राजनीति
(Geopolitics) में एक ऐसे बड़े
और अप्रत्याशित फेरबदल की आहट सुनाई
दे रही है, जो भारतीय उपमहाद्वीप
के शक्ति-संतुलन को पूरी तरह
से हिला सकता है। मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के
बीच हुए एक ऐतिहासिक रक्षा
समझौते के बाद अब
बांग्लादेश भी इस नए
'मुस्लिम डिफेंस ब्लॉक' में शामिल होने के रास्ते तलाश
रहा है।
1971 में
जिस पाकिस्तान के खिलाफ खूनी
संघर्ष करके बांग्लादेश का जन्म हुआ
था, उसी बांग्लादेश का इस्लामाबाद और
अंकारा के करीब जाना
भारत की सुरक्षा रणनीति
और कूटनीति के लिए अब
तक की सबसे बड़ी
चुनौतियों में से एक माना
जा रहा है।
1. मक्का
में रचा गया 'नाटो' जैसा रक्षा ढांचा
पूरे
घटनाक्रम की शुरुआत सऊदी
अरब के पवित्र शहर
मक्का में हुई, जहां सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के
शीर्ष प्रतिनिधियों ने मिलकर एक
त्रिपक्षी रक्षा और आर्थिक समझौते
पर दस्तखत किए।
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साझा
सुरक्षा की शर्त: इस समझौते की
सबसे चौंकाने वाली धारा ठीक उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के अनुच्छेद 5 जैसी
है। नियम के अनुसार, यदि
इस ब्लॉक में शामिल किसी भी एक देश
पर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों
देशों पर हमला माना
जाएगा और तीनों देश
मिलकर उसका सैन्य जवाब देंगे।
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तुर्की
का रक्षा विनिर्माण और सऊदी का फंड: इस गठबंधन में
तुर्की अपनी उन्नत सैन्य तकनीक और ड्रोन टेक्नोलॉजी,
पाकिस्तान अपने परमाणु अनुभव व बड़ी सेना,
और सऊदी अरब अपनी भारी वित्तीय ताकत (Financial Backing) का योगदान दे
रहे हैं।
2. बांग्लादेश
का सकारात्मक रुख: 'बांग्लादेश फर्स्ट' नीति
मक्का
समझौते के बाद अब
ढाका की ओर से
आ रहे बयानों ने भारतीय विदेश
मंत्रालय और सुरक्षा गलियारों
में चिंता बढ़ा दी है।
·
विदेश
राज्य मंत्री का बयान: बांग्लादेश के विदेश मामलों
के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने स्पष्ट कहा
कि उनका देश सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के
इस नए रक्षा-आर्थिक
ब्लॉक से जुड़ने के
विकल्प पर बेहद सकारात्मक
दृष्टिकोण रखता है।
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पाकिस्तान
से रिश्तों की नई शुरुआत: ढाका सरकार ने साफ संकेत
दिए हैं कि वह 'बांग्लादेश
फर्स्ट' की नीति के
तहत अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के
लिए कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए पाकिस्तान
के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्जीवित और
मजबूत करेगी।
·
विदेश
राज्य मंत्री श्यामा ओबेद का समर्थन: दूसरी विदेश राज्य मंत्री श्यामा ओबेद इस्लाम ने मीडिया से
बातचीत में मुहर लगाते हुए कहा कि ढाका किसी
भी गठबंधन का हिस्सा बनने
का फैसला केवल इस आधार पर
करेगा कि उससे देश
के नागरिकों का हित सुरक्षित
होता है या नहीं।
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प्रधानमंत्री
का सऊदी दौरा: बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक
रहमान को सऊदी क्राउन
प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की ओर से
रियाद का औपचारिक निमंत्रण
मिला है, जहां इस रक्षा ब्लॉक
में ढाका के शामिल होने
की औपचारिकताओं पर अंतिम मुहर
लग सकती है।
3. भारत
की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों
बढ़ा खतरा?
रणनीतिक
विश्लेषकों का मानना है
कि यदि बांग्लादेश इस सैन्य धड़े
में शामिल हो जाता है,
तो भारत के पूर्वी और
पश्चिमी दोनों मोर्चों पर एक ही
विचार वाले देशों की सैन्य मौजूदगी
दर्ज हो जाएगी।
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पूर्वोत्तर
(North-East) राज्यों
पर सीधा दबाव: भारत के पूर्वोत्तर राज्यों,
विशेषकर 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक), के पास बांग्लादेश
की सीमा लगती है। यदि बांग्लादेश इस्लामाबाद और अंकारा से
सैन्य रूप से जुड़ता है,
तो पूर्वोत्तर भारत पर रणनीतिक दबाव
कई गुना बढ़ जाएगा।
·
तुर्की
का भारत-विरोधी रुख: तुर्की (अंकारा) वैश्विक मंचों पर अक्सर भारत-विरोधी स्टैंड लेता रहा है। तुर्की के सैन्य सलाहकारों
और ड्रोन तकनीक की बांग्लादेश में
संभावित मौजूदगी भारत के लिए गंभीर
चिंता का कारण बन
सकती है।
·
बंगाल
की खाड़ी में असंतुलन: बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) अब तक
भारतीय नौसेना के प्रभाव क्षेत्र
में रही है, लेकिन इस नए गठबंधन
के तहत पाकिस्तानी और तुर्की युद्धपोतों
की बांग्लादेशी बंदरगाहों (जैसे चटगांव और मोंगला) तक
पहुंच भारत के समुद्री सुरक्षा
तंत्र को सीधा नुकसान
पहुंचाएगी।
4. कूटनीतिक
चौराहे पर भारत: आगे
क्या है रास्ता?
ढाका
का यह फैसला भारत
की विदेश नीति के लिए एक
बड़ी परीक्षा है। भारत को अपनी रणनीति
में तेजी से कुछ महत्वपूर्ण
बदलाव करने होंगे:
1.
'नेबरहुड फर्स्ट' नीति की समीक्षा: भारत को बांग्लादेश के
नए राजनीतिक नेतृत्व के साथ कूटनीतिक
संवाद के रास्ते पूरी
तरह खुले रखने होंगे ताकि ढाका को भारत की
सुरक्षा चिंताओं से अवगत कराया
जा सके।
2.
आर्थिक व व्यापारिक प्रभाव का उपयोग: बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था काफी
हद तक भारत के
साथ होने वाले व्यापार, बिजली आपूर्ति और ट्रांसिट रूटों
पर निर्भर है। भारत को अपने आर्थिक
प्रभाव का उपयोग संतुलन
बनाने के लिए करना
पड़ सकता है।
3.
पूर्वी सीमा पर सैन्य पुनर्गठन: यदि यह सैन्य ब्लॉक
आकार लेता है, तो भारत को
अपनी पूर्वी सीमा पर वायु रक्षा
प्रणाली (Air Defence
Systems) और सीमा सुरक्षा ढांचे को तुरंत अपग्रेड
करना होगा।
निष्कर्ष: मक्का से उठी इस रक्षा समझौते की लहर ने पूरे दक्षिण एशिया में एक नए 'शीत युद्ध' (Cold War) जैसे माहौल का बीज बो दिया है। अब यह देखना बेहद अहम होगा कि नई दिल्ली इस बनते हुए चक्रव्यूह को ध्वस्त करने के लिए क्या जवाबी कूटनीतिक कदम उठाती है।
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