विशेष जांच रिपोर्ट:
नई दिल्ली / जिनेवा:
दुनियाभर के बाजारों और ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स पर हर हफ्ते पेश होने वाले नए कपड़ों का ट्रेंड जितना आकर्षित करता है, उसके पीछे का सच उतना ही स्याह और डरावना है। आधुनिक उपभोक्तावाद के दौर में 'फास्ट फैशन' (Fast Fashion) ने जिस तेजी से हमारे वॉर्डरोब में अपनी जगह बनाई है, उसने न केवल वैश्विक पर्यावरण को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है, बल्कि मानवाधिकारों और मानवीय स्वास्थ्य पर भी गंभीर संकट पैदा कर दिया है।
हाल ही में आई संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की संयुक्त रिपोर्ट्स में फैशन उद्योग के इस 'काले सच' को उजागर किया गया है।
1. पर्यावरण का हत्यारा: हर सेकंड एक ट्रक कपड़ा होता है लैंडफिल
फैशन इंडस्ट्री दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जल-प्रदूषक और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में लगभग 10% की हिस्सेदार बन चुकी है।
- पानी
की भारी खपत: सिर्फ एक सूती (Cotton) टी-शर्ट बनाने में औसतन 2,700 लीटर पानी का इस्तेमाल
होता है—यह मात्रा एक सामान्य व्यक्ति के करीब ढाई-तीन साल तक पीने के पानी के बराबर है।
- प्लास्टिक
और माइक्रोप्लास्टिक का जाल: सस्ते कपड़ों में भारी मात्रा में पॉलिएस्टर,
नायलॉन और एक्रिलिक का उपयोग होता है, जो मूल रूप से प्लास्टिक हैं। कपड़े धोने के दौरान इनसे निकलने वाले सूक्ष्म माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) नदियों से होते हुए हमारे महासागरों में मिल रहे हैं और समुद्री जीवन व
खाद्य श्रृंखला को तबाह कर रहे हैं।
- कचरे
का पहाड़: एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर सेकंड कपड़ों से भरा एक ट्रक जला दिया जाता है या लैंडफिल में फेंक दिया जाता है। चिली का अटाकामा मरुस्थल (Atacama
Desert) आज फेंके गए सेकंड-हैंड और बिन बिके कपड़ों के एक विशालकाय कबाड़खाने में तब्दील हो चुका है, जिसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।
2. आधुनिक गुलामी और 'स्वेटशॉप्स' का सच
सस्ते दामों पर चमकदार कपड़े उपलब्ध कराने का खामियाजा गरीब और विकासशील देशों के कपड़ा मजदूरों को भुगतना पड़ता है।
बांग्लादेश, वियतनाम, कंबोडिया, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में स्थित हजारों गार्मेंट फैक्ट्रियों ('स्वेटशॉप्स') में लाखों मजदूर अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर हैं।
- अल्प
वेतन और लंबी शिफ्ट: गार्मेंट
वर्क्स को दैनिक न्यूनतम मजदूरी से भी काफी कम पैसा दिया जाता है, जबकि उनसे दिन में 12 से 16 घंटे काम लिया जाता है।
- महिला
व बाल श्रम: इन फैक्ट्रियों
में 80% से अधिक महिलाएं काम करती हैं। कार्यस्थल पर सुरक्षा व्यवस्था (Safety Protocols) का अभाव और शारीरिक/मानसिक शोषण आम बात है। सस्ता फैशन असल में इन मजदूरों की जिंदगी की कीमत वसूल कर तैयार किया जाता है।
3. 'टॉक्सिक फैशन': जो आप पहनते हैं, वह आपको बीमार कर रहा है
फैशन का काला सच सिर्फ फैक्ट्रियों या पर्यावरण तक सीमित नहीं है, यह सीधे तौर पर आपकी त्वचा और सेहत से भी जुड़ा है।
कपड़ों को चमकदार, वाटरप्रूफ और रिंकल-फ्री बनाने के लिए कारखानों में खतरनाक रसायनों जैसे—PFAS (फॉरएवर केमिकल्स), लेड (शीशा), थैलेट्स (Phthalates) और कार्सिनोजेनिक ऐजो डाइज (Azo Dyes) का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- ये टॉक्सिक केमिकल्स
त्वचा के जरिए शरीर में अवशोषित होते हैं।
- हालिया स्वास्थ्य
अध्ययनों में पाया गया है कि सस्ते सिंथेटिक कपड़ों का लगातार इस्तेमाल त्वचा में एलर्जी, हार्मोनल असंतुलन, बांझपन (Infertility) और यहां तक कि कैंसर जैसी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा रहा है।
4. 'ग्रीनवॉशिंग': भ्रम का खेल
जब वैश्विक स्तर पर फास्ट फैशन के खिलाफ आवाजें उठने लगीं, तो बड़ी-बड़ी फैशन ब्रांड्स ने 'ग्रीनवॉशिंग' (Greenwashing) का सहारा लेना शुरू कर दिया।
- कई कंपनियां
अपने विज्ञापनों में "सस्टेनेबल कलेक्शन", "इको-फ्रेंडली" या "100% रीसाइकिल्ड" जैसे दावों के साथ कपड़े बेचती हैं।
- हालांकि, कई स्वतंत्र
मीडिया और पर्यावरण जांचकर्ताओं ने पाया कि इनमें से अधिकांश दावे सिर्फ एक मार्केटिंग स्टंट हैं। वास्तव में बेचे जाने वाले कपड़ों का 1% से भी कम हिस्सा वास्तविक रूप से रीसायकल हो पाता है।
रास्ता क्या है? 'स्लो फैशन' और जिम्मेदार खरीदारी
फैशन विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए आम नागरिकों को अपनी जीवनशैली और सोच में बदलाव लाना होगा:
1.
'3
R' का नियम: Reduce, Reuse, Recycle यानी कम खरीदें, बार-बार पहनें और पुराने कपड़ों को रीसायकल करें।
2.
स्लो फैशन (Slow Fashion) अपनाएं: सस्ते और टिकाऊ न रहने वाले कपड़ों की जगह बेहतर गुणवत्ता और लंबे समय तक चलने वाले कपड़े चुनें।
3.
थ्रिफ्टिंग और स्वैपिंग: सेकंड-हैंड कपड़े खरीदना (Thrifting) और दोस्तों या परिवार के साथ कपड़ों की अदला-बदली करना अब एक जिम्मेदार विकल्प बन रहा है।
4.
ब्रांड्स की जवाबदेही: उपभोक्ताओं को उन ब्रांड्स से सवाल पूछना होगा कि उनके कपड़े कहां और किस स्थिति में बनाए जा रहे हैं।
निष्कर्ष:
ट्रेंड्स और 'रिल्स' के इस दौर में हमें यह समझना होगा कि हर बार बेहद सस्ते में खरीदा गया नया कपड़ा असल में मुफ़्त या सस्ता नहीं होता—उसकी असली कीमत पृथ्वी, नदियों और शोषित मजदूरों द्वारा चुकाई जा रही है।
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