नेपाल की विनाशकारी बाढ़ में दुनिया ने बढ़ाया मदद का हाथ: भारत बना प्रमुख सहयोगी, नेपाली जनता में भी दिखी सराहना

 

 काठमांडू, 29 अगस्त 2026। 

नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद अब राहत और बचाव का अभियान बड़े स्तर पर जारी है। खासकर चीन की सीमा से लगे रसुवा (Rasuwa) समेत कई इलाकों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। सैकड़ों लोगों की मौत की खबर है और बड़ी संख्या में लोग लापता हैं। इस आपदा के बाद भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ समेत कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने नेपाल की सहायता के लिए कदम उठाए हैं।

इस पूरे अंतरराष्ट्रीय राहत अभियान में भारत की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है। भारत ने शुरुआती घंटों में नेपाल से संपर्क करने के साथ राहत सामग्री भेजनी शुरू कर दी और बाद में सहायता की मात्रा लगातार बढ़ाई। साथ ही भारत ने मेडिकल और इंजीनियरिंग सहायता तथा क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को बहाल करने में सहयोग की तैयारी भी की है।

नेपाल की मदद के लिए कौन-कौन से देश आगे आए?

आपदा की गंभीरता सामने आते ही कई देशों ने नेपाल को सहायता की पेशकश की।

भारत ने सबसे पहले लगभग 10 टन आपातकालीन राहत सामग्री भेजी, जिसमें अस्थायी आश्रय सामग्री, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और दवाइयां शामिल थीं। इसके बाद सहायता बढ़ाई गई और 28 अगस्त तक भारत द्वारा भेजी गई आपातकालीन राहत सामग्री 47 टन से अधिक हो चुकी थी। इसके बाद करीब 13 टन अतिरिक्त सामग्री वाली तीसरी राहत उड़ान की भी तैयारी की गई, जिसमें पोर्टेबल जनरेटर, भोजन, जल शुद्धिकरण टैबलेट और दवाइयां शामिल थीं। Reuters ने बाद की अपनी रिपोर्ट में भारत की सहायता को करीब 50 मीट्रिक टन बताया।

चीन ने भी नेपाल के लिए आपातकालीन सामग्री और नकद सहायता का समन्वय किया है। आपदा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रभावित इलाका चीन के तिब्बत क्षेत्र की सीमा के पास है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नेपाल के राष्ट्रपति को संवेदना व्यक्त की, जबकि चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया।

दक्षिण कोरिया ने एक रिस्पॉन्स टीम भेजी है और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से 10 लाख डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। दक्षिण कोरियाई नागरिक भी इस आपदा में लापता बताए गए हैं।

ब्रिटेन ने आपातकालीन रिस्पॉन्डर्स भेजने की पेशकश करने के साथ 5 मिलियन पाउंड की सहायता घोषित की। अमेरिका ने नेपाल के लिए डिजास्टर रिस्पॉन्स एडवाइजर और करीब 5 लाख डॉलर की सहायता की घोषणा की।

ऑस्ट्रेलिया ने लगभग 3.6 मिलियन डॉलर की सहायता की घोषणा की और अतिरिक्त कांसुलर स्टाफ भेजने की बात कही। इसके अलावा यूरोपीय संघ ने भी जरूरत पड़ने पर और यूरोपीय सहायता जुटाने की तत्परता जताई है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी राहत अभियान में सहयोग किया है। UN ने अपने Central Emergency Response Fund से 2 मिलियन डॉलर आवंटित किए हैं। WHO ने दवाइयों और बहुउद्देश्यीय टेंट सहित जरूरी मेडिकल सप्लाई भेजी, जबकि International Federation of Red Cross and Red Crescent Societies ने नेपाल रेड क्रॉस के अभियान के लिए 1 मिलियन स्विस फ्रैंक की आपातकालीन फंडिंग जारी की।

भारत का रोल इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत और नेपाल के बीच करीब 1,850 किलोमीटर लंबी खुली सीमा, गहरे सांस्कृतिक संबंध और व्यापक आर्थिक संपर्क हैं। इसलिए नेपाल में बड़ी प्राकृतिक आपदा आने पर भारत के लिए प्रतिक्रिया देना केवल विदेश नीति का विषय नहीं रहता, बल्कि सीमा प्रबंधन, नागरिक सुरक्षा और मानवीय सहायता से भी सीधे जुड़ जाता है।

आपदा के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से फोन पर बातचीत की और जानमाल के नुकसान पर संवेदना जताई। मोदी ने कहा कि भारत के लोग इस कठिन समय में नेपाल के लोगों के साथ खड़े हैं और भारत हर संभव मानवीय सहायता देने के लिए तैयार है।

इसके बाद भारतीय वायुसेना के विमान से पहली खेप में करीब 10 टन राहत सामग्री नेपाल पहुंचाई गई।

फिर यह अभियान और बड़ा होता गया।

भारत ने 47 टन से अधिक आपातकालीन राहत सामग्री नेपाल भेज दी। तीसरी उड़ान में लगभग 13 टन अतिरिक्त आवश्यक सामग्री भेजने की तैयारी की गई। इसमें भोजन और दवाओं के अलावा पोर्टेबल जनरेटर और पानी साफ करने की गोलियां जैसी चीजें भी थीं, जो बाढ़ के बाद बिजली और साफ पेयजल की समस्या वाले इलाकों में महत्वपूर्ण होती हैं।

मेडिकल टीम से लेकर इंजीनियर और पुल तक की तैयारी

भारत की सहायता केवल भोजन, कंबल और दवाओं तक सीमित नहीं है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार नेपाल के अनुरोध पर भारत अतिरिक्त मानवीय सहायता की तैयारी कर रहा है। इसमें मेडिकल सपोर्ट, इंजीनियरिंग टीमें और क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर की बहाली के लिए उपकरण शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत Bailey bridges उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम कर रहा है।

बाढ़ और भूस्खलन में सड़क या पुल टूट जाने पर Bailey bridge बहुत उपयोगी होता है क्योंकि इसे अपेक्षाकृत जल्दी स्थापित कर यातायात और राहत सामग्री की आवाजाही बहाल की जा सकती है।

नेपाल के साथ आपदा सहयोग भारत के लिए नया नहीं है। सितंबर 2024 की बाढ़ और भूस्खलन के बाद भारत ने 25 टन मानवीय सहायता और 10 prefabricated steel bridges अनुदान के रूप में दिए थे।

नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को क्यों रोका?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

नेपाल ने विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों की पेशकश फिलहाल स्वीकार नहीं की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नेपाल ने सभी विदेशी सहायता ठुकरा दी है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने Reuters को बताया कि नेपाल की अपनी सुरक्षा एजेंसियां सर्च और रेस्क्यू अभियान चला रही हैं और फिलहाल विदेशी टीमों की जरूरत नहीं है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश ने अपनी सर्च एंड रेस्क्यू टीमें भेजने की पेशकश की थी।

नेपाल ने इन टीमों को फिलहाल नहीं बुलाया है, लेकिन राहत सामग्री और अन्य मानवीय सहायता अलग मामला है। इसी कारण भारत की राहत सामग्री नेपाल पहुंच रही है और नेपाल के अनुरोध पर अतिरिक्त मेडिकल तथा इंजीनियरिंग सहायता की तैयारी भी चल रही है।

सैकड़ों भारतीय भी प्रभावित, भारत चला रहा अलग अभियान

भारत के लिए यह आपदा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नेपाल और चीन की तरफ बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक मौजूद थे।

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक 28 अगस्त तक 320 भारतीय नागरिकों से संपर्क नहीं हो पाया था या उन्हें लापता बताया जा रहा था।

वहीं Trishuli-1 Hydropower Project में काम करने वाले 63 भारतीय नागरिकों को बचाया गया। चीन की ओर फंसे 96 भारतीय नागरिक सुरक्षित जमीन के रास्ते नेपाल पहुंच गए। तमिलनाडु के 21 भारतीय नागरिक, जो प्रभावित क्षेत्र से काठमांडू पहुंचे थे, उन्हें भारत वापस लाया गया।

भारत ने विदेश मंत्रालय में 24 घंटे काम करने वाला कंट्रोल रूम भी स्थापित किया और काठमांडू तथा बीजिंग स्थित भारतीय दूतावासों के जरिए सहायता अभियान चलाया।

सबसे बड़ा सवाल—भारत की मदद पर नेपाली जनता क्या कह रही है?

यह हिस्सा सावधानी से समझना जरूरी है। पूरी नेपाली जनता की राय को कुछ सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। नेपाल में भारत को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक मुद्दों पर अलग-अलग विचार पहले भी रहे हैं।

लेकिन मौजूदा आपदा में भारत की सहायता को लेकर नेपाली सोशल मीडिया के कुछ चर्चित पोस्ट में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं साफ दिखाई दे रही हैं।

नेपाल से जुड़े Reddit समुदाय में 26 अगस्त को “Thanks to India for the help” शीर्षक से एक पोस्ट सामने आई। पोस्ट में भारत के मानवीय कार्य के लिए धन्यवाद देते हुए लिखा गया:

Credit where credit is due, thank you India for the humanitarian work.

यानी मोटे तौर पर—“जहां श्रेय बनता है, वहां देना चाहिए; मानवीय सहायता के लिए भारत का धन्यवाद।”

उसी चर्चा में एक टिप्पणी में भारत और नेपाल के ऐतिहासिक रिश्तों का उल्लेख करते हुए दोनों को सदियों से भाई बताया गया। यह ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं का एक नमूना है, इसे पूरे नेपाल की सामूहिक राय नहीं माना जाना चाहिए।

28 अगस्त की एक अन्य नेपाली Reddit चर्चा में भारत से और मदद आने की खबर पर एक नेपाली टिप्पणीकार ने यह राय जताई कि भारत काफी सहायता कर रहा है, जबकि उसे चीन की सहायता उतनी दिखाई नहीं दे रही। दूसरे व्यक्ति ने जवाब दिया कि संभव है चीन की कुछ सहायता सार्वजनिक रूप से सामने न आई हो। यह भी सोशल मीडिया की व्यक्तिगत राय है, कोई आधिकारिक जनमत सर्वेक्षण नहीं।

नेपाल सरकार की ओर से क्या संकेत हैं?

नेपाल सरकार का मौजूदा रुख दो हिस्सों में दिखाई देता है—वह अपने सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन की कमान अपनी सुरक्षा एजेंसियों के हाथ में रखना चाहता है, लेकिन जरूरत के मुताबिक मानवीय, मेडिकल और इंफ्रास्ट्रक्चर सहायता स्वीकार कर रहा है।

यही कारण है कि “नेपाल ने विदेशी मदद लेने से इनकार कर दिया” कहना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। अधिक सही बात यह है कि नेपाल ने फिलहाल विदेशी search-and-rescue teams की जरूरत नहीं बताई, जबकि अंतरराष्ट्रीय राहत और मानवीय सहयोग जारी है।

संकट में फिर सामने आया भारत-नेपाल का रिश्ता

नेपाल की इस त्रासदी में दुनिया के कई देश आगे आए हैं। अमेरिका आर्थिक सहायता दे रहा है, दक्षिण कोरिया ने 10 लाख डॉलर की मदद घोषित की है, ब्रिटेन ने 5 मिलियन पाउंड देने और इमरजेंसी रिस्पॉन्डर्स भेजने की पेशकश की है, चीन राहत सहयोग कर रहा है और UN सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सक्रिय हैं।

लेकिन भौगोलिक निकटता और सहायता की तेजी तथा मात्रा के कारण भारत की भूमिका विशेष रूप से बड़ी दिखाई देती है।

करीब 50 टन तक पहुंची राहत सामग्री, मेडिकल और इंजीनियरिंग सहायता की तैयारी, क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर की बहाली में सहयोग और साथ ही नेपाल तथा चीन में फंसे अपने नागरिकों को निकालने का अभियान—भारत एक साथ कई स्तरों पर काम कर रहा है।

और नेपाली सोशल मीडिया पर सामने आई कुछ प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि इस मुश्किल समय में भारत की तत्काल सहायता को नेपाल के लोगों के एक हिस्से ने खुले तौर पर सराहा है। हालांकि इसे पूरे देश की राय बताना सही नहीं होगा।

फिलहाल नेपाल की सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों को खोजना, प्रभावित इलाकों तक भोजन और दवाइयां पहुंचाना और टूटे हुए सड़क-पुल तथा अन्य बुनियादी ढांचे को जल्द बहाल करना है। आने वाले दिनों में यह भी साफ होगा कि नेपाल किन देशों से किस प्रकार की अतिरिक्त सहायता स्वीकार करता है और पुनर्निर्माण के अगले चरण में भारत की भूमिका कितनी बड़ी होती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ