नई दिल्ली: भारत की न्याय व्यवस्था एक गहरी संरचनात्मक चुनौती से जूझ रही है—लाखों नहीं, करोड़ों मामलों का लंबित बोझ। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार, देश की विभिन्न अदालतों में कुल लंबित मामलों की संख्या 5 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। इनमें सबसे अधिक मामले निचली अदालतों में अटके हुए हैं, जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित मामलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण है न्यायाधीशों की भारी कमी। स्वीकृत पदों की तुलना में बड़ी संख्या में पद खाली पड़े रहते हैं, जिससे मौजूदा जजों पर कार्यभार कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, बार-बार स्थगन (adjournment) की संस्कृति, जांच एजेंसियों की धीमी प्रक्रिया, और मामलों की जटिलता भी देरी का कारण बनती है। कई मामलों में सरकारी विभाग सबसे बड़े वादी (litigant) के रूप में सामने आते हैं, जिससे सरकारी अपीलों की भरमार न्याय प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ डालती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कई जिलों में अदालतों के पास पर्याप्त कोर्ट रूम, स्टाफ और डिजिटल सुविधाएं नहीं हैं। ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में तो स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, जहां तकनीकी संसाधनों की सीमित उपलब्धता सुनवाई की गति को प्रभावित करती है।
हालांकि, सुधार की दिशा में प्रयास भी जारी हैं। ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट के तहत डिजिटल फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और ऑनलाइन केस ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं शुरू की गई हैं। कोविड-19 के दौरान वर्चुअल हियरिंग ने यह दिखाया कि तकनीक न्यायिक प्रक्रिया को तेज और सुलभ बना सकती है। इसके अलावा, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और लोक अदालतों के माध्यम से छोटे और विशेष मामलों को शीघ्र निपटाने की कोशिश हो रही है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीक ही समाधान नहीं है। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को तेज करना, वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) जैसे मध्यस्थता और सुलह तंत्र को बढ़ावा देना, और सरकारी मुकदमों को कम करना भी जरूरी है। साथ ही, केस मैनेजमेंट सिस्टम को सख्ती से लागू करना होगा ताकि अनावश्यक देरी रोकी जा सके।
लंबित मामलों का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इससे आम नागरिकों का न्याय पर भरोसा प्रभावित होता है। वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने से आर्थिक और मानसिक दबाव दोनों बढ़ते हैं। न्याय में देरी, न्याय से वंचित होने जैसा महसूस होता है।
भारत की न्याय प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में से एक है। चुनौती बड़ी है, लेकिन सुधार की संभावनाएं भी उतनी ही व्यापक हैं। सवाल अब यह है कि क्या संरचनात्मक बदलाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति मिलकर न्याय की रफ्तार को वह गति दे पाएंगे, जिसकी देश को सख्त जरूरत है।
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