नई दिल्ली | डिजिटल डेस्क 3 जनवरी, 2026
आज के डिजिटल युग में, हमारे स्मार्टफोन सूचना कम और अफवाहें ज्यादा फैला रहे हैं। WhatsApp, Facebook और X (Twitter) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हिंदू-मुस्लिम से जुड़ी खबरों और वीडियो की बाढ़ सी आ गई है। किसी भी छोटी सी घटना को 'धार्मिक रंग' देकर इस तरह पेश किया जाता है कि वह मिनटों में वायरल (Viral) हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि 'वायरल कंटेंट' की यह अंधी दौड़ समाज के भाईचारे के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
कैसे बुना जाता है अफवाहों का जाल?
अक्सर देखा गया है कि किसी पुरानी घटना या दूसरे देश के वीडियो को भारत का बताकर शेयर किया जाता है। भड़काऊ कैप्शन और इमोशनल शब्दों का इस्तेमाल करके लोगों को उकसाया जाता है। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम (Algorithm) भी उन्हीं पोस्ट्स को ज्यादा प्रमोट करता है जिन पर लोग गुस्से या डर में आकर रिएक्ट करते हैं। यही वजह है कि विवादित कंटेंट जंगल की आग की तरह फैलता है।
राजनीति और नैरेटिव की लड़ाई
भारत की सियासत में हिंदू-मुस्लिम मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। चुनावों के आसपास फेक न्यूज़ (Fake News) की रफ्तार और भी तेज हो जाती है। राजनीतिक रैलियों के पुराने भाषणों को काट-छांट कर पेश किया जाता है ताकि जनता के बीच एक खास नैरेटिव सेट किया जा सके। इस खींचतान में असली मुद्दे कहीं पीछे छूट जाते हैं और सिर्फ धर्म की राजनीति चर्चा में रहती है।
ऑनलाइन तनाव बनाम ज़मीनी हकीकत
अगर हम अपने मोबाइल फोन को किनारे रखकर सड़कों, बाज़ारों और दफ्तरों को देखें, तो हकीकत कुछ और ही नज़र आती है। ज़मीनी स्तर (Ground level) पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय आज भी मिलकर काम कर रहे हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं। लेकिन ऑनलाइन दुनिया में ऐसा माहौल बना दिया जाता है जैसे हर तरफ तनाव है। जानकारों का कहना है कि डिजिटल परसेप्शन (Perception) और असल ज़िंदगी के बीच की यह दूरी समाज में गलतफहमी पैदा कर रही है।
फैक्ट-चेक: सच और झूठ की पहचान
फैक्ट-चेक करने वाली एजेंसियों ने बार-बार खुलासा किया है कि वायरल होने वाले ज्यादातर धार्मिक वीडियो या तो एडिटेड होते हैं या फिर उनका संदर्भ गलत होता है। फोटो और वीडियो के साथ छेड़छाड़ करके उन्हें नफरत फैलाने का जरिया बनाया जाता है। यह सिर्फ अफवाह नहीं है, बल्कि इससे कई बार कानून-व्यवस्था (Law and Order) के लिए भी बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है।
प्रशासन की सख्ती और हमारी जिम्मेदारी
अब पुलिस और प्रशासन सोशल मीडिया की निगरानी (Monitoring) को लेकर काफी सख्त हो गए हैं। कई राज्यों में भड़काऊ पोस्ट डालने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जा रही है। अदालतों ने भी साफ कर दिया है कि धर्म के नाम पर नफरत फैलाना एक गंभीर अपराध है। लेकिन सिर्फ कानून काफी नहीं है, आम जनता को भी यह समझना होगा कि हर वायरल चीज़ सच नहीं होती।
निष्कर्ष: वायरल नहीं, वेरिफाइड पर भरोसा करें
हिंदू-मुस्लिम से जुड़ी वायरल खबरें आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती हैं। यह सिर्फ धर्म का नहीं, बल्कि देश की एकता और शांति का सवाल है। ज़रूरत है कि हम अपनी जिम्मेदारी समझें और किसी भी पोस्ट को 'फॉरवर्ड' करने से पहले उसकी सच्चाई की जांच करें। जब तक हम समझदारी नहीं दिखाएंगे, तब तक डिजिटल दुनिया की अफवाहें हमारे आपसी रिश्तों को कमजोर करती रहेंगी।
0 Comments