नई दिल्ली | हेल्थ डेस्क 3 जनवरी, 2026
भारत आज एक अजीबोगरीब स्वास्थ्य विरोधाभास के मुहाने पर खड़ा है। जहाँ हम 'मेडिकल टूरिज्म' के वैश्विक केंद्र बन रहे हैं, वहीं देश की एक बड़ी आबादी बुनियादी इलाज के लिए आज भी संघर्ष कर रही है। 'स्वस्थ भारत' के सपने और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को पाटने के लिए अब केवल दवाओं की नहीं, बल्कि एक व्यापक सिस्टम बदलाव की ज़रूरत है।
1. साइलेंट किलर: युवाओं को घेरती लाइफस्टाइल बीमारियाँ
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। भारत अब 'दुनिया की डायबिटीज राजधानी' बनने की ओर अग्रसर है।
- खतरा: हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं, बल्कि 25-35 साल के युवाओं को अपनी चपेट में ले रहे हैं।
- कारण: जंक फूड की बढ़ती खपत, शारीरिक निष्क्रियता और 'स्क्रीन टाइम' में बेतहाशा बढ़ोतरी। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि जीवनशैली नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ी का औसत जीवनकाल घट सकता है।
2. इलाज का अर्थशास्त्र: जेब पर भारी पड़ती बीमारियाँ
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा दो विपरीत दिशाओं में बंटा हुआ है:
| श्रेणी | स्थिति और चुनौती |
| सरकारी अस्पताल | आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से राहत, लेकिन भारी भीड़, डॉक्टरों की कमी और बुनियादी ढाँचे का अभाव बड़ी बाधा। |
| निजी अस्पताल | आधुनिक तकनीक और बेहतर सेवा, लेकिन इलाज का खर्च इतना अधिक कि एक गंभीर बीमारी मध्यम वर्गीय परिवार को कर्ज़ के जाल में धकेल देती है। |
3. मानसिक स्वास्थ्य: 'खामोश' महामारी
कोविड-19 के बाद से तनाव (Stress) और अवसाद (Depression) के मामलों में 25% की वृद्धि देखी गई है।
- सामाजिक कलंक: आज भी समाज में मानसिक बीमारी को 'पागलपन' से जोड़कर देखा जाता है, जिससे लोग मदद मांगने से कतराते हैं।
- ज़रूरत: विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्कूलों और दफ्तरों में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श को अनिवार्य किया जाए।
4. पर्यावरण और कुपोषण की दोहरी मार
- प्रदूषण: दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगरों में सांस लेना 'धीमे ज़हर' के समान है। अस्थमा और हार्ट अटैक के मामलों का सीधा संबंध गिरती वायु गुणवत्ता से पाया गया है।
- महिला एवं बाल स्वास्थ्य: एनीमिया (खून की कमी) और कुपोषण आज भी ग्रामीण भारत की बड़ी चुनौतियां हैं। संस्थागत प्रसव बढ़ने के बावजूद मातृ स्वास्थ्य पर और ध्यान देने की आवश्यकता है।
5. सरकारी पहल और भविष्य का खाका
सरकार ने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को डिजिटल बनाने के लिए 'डिजिटल हेल्थ मिशन' और दूरदराज के इलाकों के लिए 'टेलीमेडिसिन' जैसी सेवाओं को बढ़ावा दिया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि:
- स्वास्थ्य बजट को जीडीपी के 2.5% तक ले जाना अनिवार्य है।
- प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स (PHC) को और अधिक सशक्त बनाना होगा ताकि बड़े अस्पतालों पर बोझ कम हो।
निष्कर्ष: 'बचाव ही उपचार है'
रिपोर्ट का सारांश यही है कि भारत को अब 'बीमारी के इलाज' से हटकर 'स्वास्थ्य के बचाव' (Preventive Healthcare) पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जब तक हर नागरिक स्वास्थ्य को एक 'व्यक्तिगत निवेश' के रूप में नहीं देखेगा, तब तक व्यवस्था पर दबाव कम नहीं होगा।
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