विशेष रिपोर्ट: सीमा, सुरक्षा और सियासत – रोहिंग्या और बांग्लादेशी प्रवासियों का संकट

 नई दिल्ली | विशेष संवाददाता 3 जनवरी, 2026

भारत में 'अवैध घुसपैठ' का मुद्दा अब केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय विमर्श बन चुका है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों और असम-पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने इस आग को और हवा दे दी है। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा की दलीलें हैं, तो दूसरी तरफ मानवाधिकारों की दुहाई।

1. मुख्य बिंदु: राजनीति के केंद्र में 'घुसपैठ'

भारतीय राजनीति में यह मुद्दा तीन धुरियों पर घूम रहा है:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा: सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है कि बिना दस्तावेजों के रहने वाले लोग आंतरिक सुरक्षा और खुफिया नेटवर्क के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
  • जनसांख्यिकी और संसाधन: स्थानीय नागरिकों में इस बात का डर है कि सीमित संसाधनों (नौकरी, स्वास्थ्य, शिक्षा) पर इन प्रवासियों के कारण बोझ बढ़ रहा है।
  • वोट पॉलिटिक्स: सत्ता पक्ष इसे 'राष्ट्रवाद' से जोड़ता है, जबकि विपक्ष इसे 'ध्रुवीकरण' और मानवीय संकट करार देता है।

2. रोहिंग्या और बांग्लादेशी प्रवासी: वर्तमान स्थिति

म्यांमार के रखाइन प्रांत से आए रोहिंग्या और सीमा पार कर आए बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के लिए सरकार ने 2025-26 में अभियान तेज कर दिया है।

क्षेत्रस्थिति
पश्चिम बंगालSIR (Special Intensive Revision) के कारण डर का माहौल; हजारों संदिग्ध प्रवासियों के सीमा पार लौटने की खबरें।
असममुख्यमंत्री का 'रुथलेस' (कठोर) अभियान; 2025 में बड़े पैमाने पर 'पुशबैक' की कार्रवाई की गई।
दिल्ली/NCRसरकारी स्कूलों में रोहिंग्या बच्चों के दाखिले और झुग्गियों में रहने वाले अवैध प्रवासियों पर कड़ी निगरानी।

3. कानून और न्यायपालिका का रुख

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि:

"अवैध रूप से प्रवेश करने वाले लोग उन मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकते जो केवल भारतीय नागरिकों के लिए हैं।"

भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए वह रोहिंग्याओं को 'शरणार्थी' के बजाय 'अवैध प्रवासी' मानता है। फॉरेनर्स एक्ट, 1946 के तहत उन्हें वापस भेजने (डिपोर्टेशन) की प्रक्रिया जारी है।

4. मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय हित

विपक्षी दल और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन (जैसे Human Rights Watch) भारत सरकार की आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि:

  • बिना उचित प्रक्रिया के लोगों को वापस भेजना 'नॉन-रेफयूलमेंट' (उत्पीड़न वाले देश में न भेजना) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के खिलाफ है।
  • हजारों लोग डिटेंशन सेंटरों में अनिश्चित भविष्य के साथ रह रहे हैं।

निष्कर्ष: आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि इस जटिल समस्या का समाधान केवल चुनावी रैलियों में नहीं, बल्कि कूटनीति में छिपा है। जब तक म्यांमार और बांग्लादेश के साथ प्रत्यर्पण की ठोस नीति नहीं बनती, यह मुद्दा भारत की आंतरिक राजनीति को गरमाता रहेगा। सुरक्षा और संवेदना के बीच एक बारीक लकीर है, जिसे साधना भारत के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है।

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