Agriculture News | परंपरागत खेती से तकनीकी खेती तक: भारतीय कृषि में आया बड़ा बदलाव

 

नई दिल्ली।
भारत की कृषि व्यवस्था बीते कुछ दशकों में तेज़ी से बदली है। जहाँ एक ओर परंपरागत तरीकों से की जाने वाली खेती पीढ़ियों तक किसानों का सहारा रही, वहीं दूसरी ओर आधुनिक तकनीक आधारित खेती ने उत्पादन, आय और दक्षता के नए रास्ते खोले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पुरानी और नई खेती के तरीकों के बीच आया यह अंतर भारतीय कृषि के भविष्य को तय करने वाला साबित हो रहा है।

परंपरागत खेती मुख्यतः मानव श्रम, पशु शक्ति और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रही है। हल-बैल से जुताई, वर्षा पर निर्भर सिंचाई, देसी बीज और गोबर की खाद जैसे उपाय आम थे। इस खेती में लागत कम होती थी और पर्यावरण पर असर भी सीमित रहता था, लेकिन उत्पादन अनिश्चित रहता था। मौसम की मार, कीट प्रकोप और जल की कमी के कारण किसानों को अक्सर नुकसान झेलना पड़ता था।

इसके विपरीत, नए ज़माने की तकनीकी खेती में मशीनीकरण और वैज्ञानिक तरीकों का व्यापक उपयोग हो रहा है। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकों ने खेती को तेज़ और सटीक बना दिया है। उन्नत बीज, संतुलित उर्वरक और कीटनाशकों के प्रयोग से फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इससे किसानों की प्रति एकड़ उपज बढ़ी है और बाजार तक पहुँच भी आसान हुई है।

तकनीकी खेती का एक बड़ा बदलाव डिजिटल और डेटा आधारित निर्णय हैं। आज किसान मोबाइल ऐप्स के जरिए मौसम की जानकारी, फसल सलाह और मंडी भाव प्राप्त कर रहे हैं। ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी से फसल की निगरानी, कीट पहचान और पानी के सही उपयोग में मदद मिल रही है। इससे संसाधनों की बर्बादी कम हुई है और लागत नियंत्रण बेहतर हुआ है।

हालांकि, तकनीकी खेती के साथ कुछ चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। मशीनों और आधुनिक उपकरणों की ऊँची लागत छोटे किसानों के लिए समस्या बन सकती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका भी जताई जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संतुलन रखा गया, तो दीर्घकाल में यह नुकसानदेह हो सकता है।

इसी बीच, संयोजित या संतुलित मॉडल की चर्चा तेज़ हो रही हैजहाँ परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल हो। जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और प्रिसिजन फार्मिंग जैसे तरीकों से उत्पादन बढ़ाते हुए पर्यावरण संरक्षण भी संभव माना जा रहा है। सरकार और कृषि वैज्ञानिक किसानों को प्रशिक्षण देकर इसी दिशा में आगे बढ़ने की सलाह दे रहे हैं।

निष्कर्षतः, पुरानी और नई खेती के बीच आया अंतर केवल तकनीक का नहीं, बल्कि सोच का भी है। परंपरागत खेती ने टिकाऊपन सिखाया, जबकि आधुनिक खेती ने उत्पादकता बढ़ाई। आने वाले समय में इन दोनों का संतुलित उपयोग ही भारतीय कृषि को मज़बूत और किसानों को समृद्ध बना सकता है।

 

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