मेरठ,
उत्तर
प्रदेश
| 15 अक्टूबर 2026 | विशेष समाचार
रिपोर्ट
मेरठ
के
बहुचर्चित सौरभ
राजपूत
हत्याकांड में
अदालत
ने
ऐतिहासिक महत्व
का
फैसला
सुनाते
हुए
मृतक
की
पत्नी
मुस्कान रस्तोगी और
उसके
प्रेमी
साहिल
शुक्ला
को
मौत
की
सजा
सुनाई
है।
मार्च
2025 में
हुई
इस
निर्मम
हत्या
ने
पूरे
देश
को
झकझोर
दिया
था।
हत्या
के
बाद
शव
को
टुकड़ों में
काटकर
सीमेंट
से
भरे
नीले
प्लास्टिक के
ड्रम
में
छिपा
दिया
गया
था।
उत्तर
प्रदेश
के
मेरठ
जिले
में
हुए
चर्चित
'नीला
ड्रम
हत्याकांड' में
14 अक्टूबर 2026 को
जिला
एवं
सत्र
न्यायालय ने
दोनों
दोषियों को
फांसी
की
सजा
सुनाई।
जिला
जज
अरविंद
कुमार
मिश्रा
की
अदालत
ने
30 सितंबर
2026 को
मुस्कान रस्तोगी और
साहिल
शुक्ला
को
हत्या
तथा
साक्ष्य मिटाने
का
दोषी
ठहराया
था।
इसके
बाद
सजा
पर
सुनवाई
हुई
और
दोनों
को
मृत्युदंड दिया
गया।
इस
मुकदमे
में
126 सुनवाइयां हुईं
और
अभियोजन पक्ष
ने
22 गवाह
प्रस्तुत किए।
अदालत
का
फैसला
आने
के
बाद
मृतक
सौरभ
राजपूत
के
परिवार
ने
संतोष
व्यक्त
किया।
हालांकि कानूनी
प्रक्रिया के
अनुसार
मृत्युदंड पर
इलाहाबाद उच्च
न्यायालय की
पुष्टि
आवश्यक
है।
कैसे शुरू हुई इस सनसनीखेज हत्याकांड की कहानी?
सौरभ
राजपूत
मर्चेंट नेवी
से
जुड़े
हुए
थे
और
अपने
परिवार
के
साथ
बेहतर
भविष्य
की
उम्मीद
रखते
थे।
फरवरी
2025 के
अंतिम
सप्ताह
में
वह
विदेश
से
मेरठ
लौटे
थे।
लेकिन
उन्हें
अंदाजा
नहीं
था
कि
कुछ
ही
दिनों
बाद
उनकी
हत्या
कर
दी
जाएगी।
जांच
और
अभियोजन पक्ष
के
अनुसार,
मुस्कान रस्तोगी और
साहिल
शुक्ला
के
बीच
प्रेम
संबंध
थे।
दोनों
ने
मिलकर
सौरभ
को
रास्ते
से
हटाने
की
साजिश
रची।
आरोप
था
कि
सौरभ
को
नशीला
पदार्थ
देकर
बेहोश
किया
गया
और
इसके
बाद
धारदार
हथियार
से
उनकी
हत्या
कर
दी
गई।
हत्या
के
बाद
दोनों
ने
शव
के
टुकड़े
किए
और
उन्हें
एक
बड़े
नीले
प्लास्टिक के
ड्रम
में
रख
दिया।
शव
को
छिपाने
के
लिए
ड्रम
में
सीमेंट
और
रेत
का
इस्तेमाल किया
गया,
ताकि
अपराध
का
पता
आसानी
से
न
चल
सके।
नीले ड्रम ने खोला हत्या का खौफनाक राज
इस
हत्याकांड का
सबसे
भयावह
पहलू
शव
को
छिपाने
का
तरीका
था।
पुलिस
जांच
के
दौरान
जब
नीले
ड्रम
का
पता
चला,
तब
मामले
की
गंभीरता सामने
आई।
ड्रम
में
सीमेंट
जम
जाने
के
कारण
शव
को
बाहर
निकालना भी
चुनौतीपूर्ण था।
पुलिस
ने
घटनास्थल से
मिले
साक्ष्यों को
सुरक्षित किया
और
फॉरेंसिक जांच
की
सहायता
ली।
घटना
के
बाद
मुस्कान और
साहिल
हिमाचल
प्रदेश
चले
गए
थे।
पुलिस
जांच
आगे
बढ़ने
पर
दोनों
को
मार्च
2025 में
गिरफ्तार किया
गया।
गिरफ्तारी के
बाद
पूछताछ,
तकनीकी
साक्ष्यों और
अन्य
सबूतों
के
आधार
पर
पुलिस
ने
पूरे
घटनाक्रम की
कड़ियां जोड़ने
का
प्रयास
किया।
इस
मामले
को
'नीला
ड्रम
हत्याकांड' के
नाम
से
व्यापक
पहचान
मिली
और
यह
राष्ट्रीय समाचारों में
चर्चा
का
विषय
बन
गया।
1000 पन्नों की चार्जशीट और 22 गवाहों ने मजबूत किया मामला
सौरभ
राजपूत
हत्याकांड की
जांच
के
दौरान
पुलिस
ने
विस्तृत साक्ष्य एकत्र
किए।
मई
2025 में
करीब
एक
हजार
पन्नों
की
चार्जशीट अदालत
में
दाखिल
की
गई।
इसमें
फॉरेंसिक रिपोर्ट, कॉल
डिटेल
रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज
तथा
विभिन्न व्यक्तियों के
बयान
शामिल
थे।
जांच
में
मेडिकल
स्टोर
संचालक,
ड्रम
और
सीमेंट
बेचने
वाले
दुकानदारों, टैक्सी
चालक
तथा
अन्य
संबंधित व्यक्तियों के
बयान
भी
दर्ज
किए
गए।
इस
मामले
में
हत्या
का
कोई
प्रत्यक्षदर्शी गवाह
सामने
नहीं
आया
था।
इसलिए
अभियोजन पक्ष
ने
परिस्थितिजन्य और
वैज्ञानिक साक्ष्यों की
मदद
से
अपराध
की
पूरी
श्रृंखला अदालत
के
सामने
प्रस्तुत की।
लंबी
न्यायिक प्रक्रिया के
दौरान
22 अभियोजन गवाहों
के
बयान
दर्ज
हुए।
अंततः
अदालत
ने
उपलब्ध
साक्ष्यों के
आधार
पर
मुस्कान और
साहिल
को
दोषी
पाया।
अदालत में सजा सुनते ही भावुक हुए दोनों दोषी
14 अक्टूबर को
सजा
सुनाए
जाने
के
दौरान
मुस्कान और
साहिल
को
जेल
से
वीडियो
कॉन्फ्रेंसिंग के
माध्यम
से
अदालत
के
सामने
पेश
किया
गया।
दोनों
को
अपना
पक्ष
रखने
का
अवसर
दिया
गया।
बचाव
पक्ष
की
अधिवक्ता रेखा
जैन
ने
मुस्कान की
दो
बेटियों के
भविष्य
और
पालन-पोषण का हवाला
देते
हुए
सजा
में
नरमी
बरतने
का
अनुरोध
किया।
दूसरी
ओर
सरकारी
अधिवक्ता कृष्ण
कुमार
चौबे
ने
अपराध
की
गंभीरता को
देखते
हुए
मृत्युदंड की
मांग
की।
अदालत
का
फैसला
सुनने
के
बाद
दोनों
दोषी
भावुक
हो
गए।
अभियोजन पक्ष
ने
दलील
दी
कि
हत्या
की
पूर्वनियोजित साजिश,
अपराध
की
क्रूरता और
साक्ष्य छिपाने
के
प्रयास
को
देखते
हुए
कठोरतम
दंड
दिया
जाना
चाहिए।
सौरभ की मां को मिला न्याय, लेकिन बेटे को खोने का दर्द बरकरार
अदालत
के
फैसले
के
बाद
सौरभ
राजपूत
की
मां
रेणु
देवी
भावुक
हो
गईं।
उन्होंने बताया
कि
वह
लंबे
समय
से
अपने
बेटे
के
हत्यारों को
कठोर
सजा
मिलने
की
प्रार्थना कर
रही
थीं।
परिवार
ने
इस
फैसले
पर
संतोष
जताया,
लेकिन
यह
भी
स्पष्ट
है
कि
किसी
भी
न्यायिक फैसले
से
सौरभ
की
कमी
पूरी
नहीं
हो
सकती।
सौरभ
के
परिजनों के
लिए
पिछले
डेढ़
वर्ष
से
अधिक
समय
बेहद
कठिन
रहा।
बेटे
की
हत्या,
पुलिस
जांच
और
लंबी
अदालती
कार्यवाही ने
पूरे
परिवार
को
मानसिक
पीड़ा
पहुंचाई।
परिवार
का
मानना
है
कि
इस
तरह
के
अपराधों में
कठोर
न्यायिक कार्रवाई समाज
को
एक
महत्वपूर्ण संदेश
देती
है।
क्या अब तुरंत होगी फांसी?
अदालत
द्वारा
मृत्युदंड सुनाए
जाने
का
अर्थ
यह
नहीं
है
कि
दोषियों को
तुरंत
फांसी
दे
दी
जाएगी।
भारतीय
कानून
के
अनुसार
सत्र
न्यायालय द्वारा
सुनाई
गई
मौत
की
सजा
की
पुष्टि
संबंधित उच्च
न्यायालय से
होना
आवश्यक
है।
इस
मामले
में
इलाहाबाद उच्च
न्यायालय की
पुष्टि
जरूरी
होगी।
दोषियों के
पास
फैसले
को
चुनौती
देने
और
कानून
के
अंतर्गत उपलब्ध
अन्य
न्यायिक उपाय
अपनाने
का
अधिकार
भी
है।
इसलिए
फांसी
की
वास्तविक प्रक्रिया पूरी
होने
में
समय
लग
सकता
है।
देशभर में चर्चा का विषय बना फैसला
मेरठ
का
यह
हत्याकांड केवल
एक
आपराधिक घटना
नहीं
रहा,
बल्कि
इसने
पारिवारिक संबंधों, विश्वास, अपराध
की
मानसिकता और
न्यायिक व्यवस्था पर
भी
गंभीर
सवाल
खड़े
किए।
एक
व्यक्ति की
हत्या
और
उसके
शव
को
इस
प्रकार
छिपाने
की
घटना
ने
लोगों
को
स्तब्ध
कर
दिया
था।
सोशल
मीडिया
से
लेकर
राष्ट्रीय समाचार
माध्यमों तक
इस
मामले
की
व्यापक
चर्चा
हुई।
अब
अदालत
के
फैसले
के
बाद
एक
बार
फिर
यह
मामला
सुर्खियों में
है।
हालांकि अंतिम
न्यायिक प्रक्रिया अभी
पूरी
नहीं
हुई
है,
लेकिन
सत्र
न्यायालय का
यह
निर्णय
मामले
में
एक
महत्वपूर्ण पड़ाव
है।
निष्कर्ष: सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सुनाई गई फांसी की सजा पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में बड़ा कदम है। यह मामला बताता है कि गंभीर अपराधों की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्य, तकनीकी प्रमाण और गवाहों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। अब सभी की नजरें आगे की न्यायिक प्रक्रिया और उच्च न्यायालय के निर्णय पर रहेंगी।

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