नई दिल्ली।
यह सिर्फ एक अफ़वाह नहीं थी, यह एक सोची-समझी रणनीति थी। एक फिल्म को चर्चा में लाने के लिए कुछ लोगों ने पूरे देश को डराने का काम किया और उसकी कीमत चुकाई देश की राजधानी ने। सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए यह नैरेटिव फैलाया गया कि दिल्ली से लड़कियाँ रहस्यमय तरीके से गायब हो रही हैं। देखते ही देखते यह बात इतनी तेज़ी से फैली कि लोग सच और झूठ में फर्क करना ही भूल गए।
इस अफ़वाह का असर सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। मुंबई, उत्तराखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों से फोन आने लगे। लोग घबराए हुए थे। माता-पिता अपनी बेटियों को लेकर डरे हुए थे। कई लोगों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया कि दिल्ली अब सुरक्षित नहीं रही, वहाँ लॉ एंड ऑर्डर पूरी तरह फेल हो चुका है। सवाल उठाए जाने लगे कि दिल्ली पुलिस क्या कर रही है, सरकार कहाँ है, और कोई जवाब क्यों नहीं दे रहा।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस डर को और हवा दी। “मिसिंग गर्ल”, “दिल्ली से लड़कियाँ गायब”, जैसे शब्दों ने पूरे देश में एक दहशत का माहौल बना दिया। कई महिलाओं को यह तक कहा गया कि आप हर मुद्दे पर बोलती हैं, इस पर चुप क्यों हैं? जब असल में मुद्दा था ही नहीं।
अब जब सच्चाई सामने आ चुकी है और यह साफ हो गया है कि न कहीं कोई संगठित अपराध था, न ही लड़कियों के गायब होने का कोई पैटर्न, तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है। अगर यह सब एक फिल्म के प्रमोशन के लिए किया गया था, तो यह न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि बेहद खतरनाक भी है। इस तरह की झूठी खबरें समाज में डर, अविश्वास और अराजकता फैलाती हैं।
यह सिर्फ दिल्ली की छवि खराब करने का मामला नहीं है। यह पूरे देश में अफ़वाहों के ज़रिए भय पैदा करने का उदाहरण है। जब लोग सच जाने बिना डरने लगते हैं, तो इसका सीधा असर समाज की मानसिक शांति पर पड़ता है। इससे कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं और पुलिस व प्रशासन की साख पर भी असर पड़ता है।
इस पूरे मामले को देखते हुए सरकार और खासतौर पर गृह मंत्रालय से सख़्त अपील है कि इस तरह की अफ़वाहें फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। चाहे वे कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, चाहे उनका संबंध किसी बड़े प्रोजेक्ट या इंडस्ट्री से ही क्यों न हो, उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए।
अगर आज इस तरह का डर फैलाने वालों को छोड़ दिया गया, तो कल कोई और अपने फायदे के लिए पूरे देश को फिर से डराने की कोशिश करेगा। कानून का मकसद सिर्फ अपराध के बाद सज़ा देना नहीं होता, बल्कि भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकना भी होता है। इस मामले में सख़्त कार्रवाई एक ज़रूरी संदेश होगी कि देश में डर बेचकर प्रमोशन करने की इजाज़त किसी को नहीं है।
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