कोविड-19 महामारी के दौरान भी स्वास्थ्य क्षेत्र में कई विवाद सामने आए। ऑक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर और PPE किट की खरीद में ओवरप्राइसिंग के आरोप लगे। कुछ राज्यों में अस्पतालों पर मरीजों से अत्यधिक बिल वसूलने की शिकायतें दर्ज हुईं। कई निजी अस्पतालों पर जांच बैठाई गई और कुछ पर जुर्माना भी लगाया गया। महामारी ने यह उजागर किया कि आपात स्थिति में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना कितना जरूरी है।
बीमा योजनाओं में भी अनियमितताओं की खबरें सामने आई हैं। आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में फर्जी मरीज दिखाकर क्लेम लेने के आरोप लगे। कुछ निजी अस्पतालों पर यह आरोप था कि उन्होंने ऐसे मरीजों का नाम दर्ज किया जो वास्तव में भर्ती नहीं थे। जांच के बाद कई अस्पतालों को योजना से अस्थायी रूप से निलंबित किया गया। सरकार ने डिजिटल ट्रैकिंग और ऑडिट सिस्टम मजबूत करने की बात कही।
चिकित्सा शिक्षा भी विवादों से अछूती नहीं रही। मेडिकल कॉलेजों की मान्यता, सीटों की बिक्री और प्रवेश प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों के मामले सामने आए। मेडिकल काउंसिल से जुड़े कुछ अधिकारियों पर भी रिश्वत लेने के आरोप लगे। इसके बाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के गठन के जरिए सुधार की कोशिश की गई, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके।
फार्मास्युटिकल कंपनियों और डॉक्टरों के बीच कथित ‘कमीशन संस्कृति’ भी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। आरोप यह है कि कुछ डॉक्टर विशेष दवाएं या जांच लिखने के बदले प्रोत्साहन प्राप्त करते हैं। मेडिकल एथिक्स नियमों में इस पर स्पष्ट प्रतिबंध है, लेकिन निगरानी की चुनौतियां बनी रहती हैं। मेडिकल काउंसिल और नियामक संस्थाओं ने इस पर सख्ती बढ़ाने की बात कही है।
कुछ बड़े मामलों में अस्पताल प्रबंधन पर अंग प्रत्यारोपण से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप भी लगे। अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट के मामले समय-समय पर उजागर हुए, जिनमें बिचौलियों और कुछ स्वास्थ्य कर्मियों की गिरफ्तारी हुई। ये मामले दिखाते हैं कि जब लालच सिस्टम में घुसता है तो मानवीय संवेदना पीछे छूट जाती है।
इसके अलावा, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में ‘भूतिया कर्मचारी’ यानी ऐसे स्टाफ जिनका नाम वेतन सूची में है लेकिन वे ड्यूटी पर मौजूद नहीं होते, जैसे आरोप भी सामने आए। इससे न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग होता है बल्कि मरीजों को जरूरी सेवाएं भी नहीं मिल पातीं।
हालांकि यह भी सच है कि पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र को भ्रष्ट कहना गलत होगा। लाखों डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी ईमानदारी से काम कर रहे हैं। समस्या मुख्यतः सिस्टम की कमजोर निगरानी, पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही की ढीली व्यवस्था से जुड़ी है।
सरकार और नियामक संस्थाओं ने डिजिटल रिकॉर्ड, ई-टेंडरिंग, बायोमेट्रिक उपस्थिति और ऑनलाइन क्लेम वेरिफिकेशन जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने भी समय-समय पर कड़े निर्देश दिए हैं। लेकिन सुधार की प्रक्रिया लगातार चलने वाली है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार का असर सीधे आम नागरिक पर पड़ता है। इलाज महंगा होता है, भरोसा टूटता है और जरूरतमंद मरीज प्रभावित होते हैं। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता, मजबूत ऑडिट सिस्टम और व्हिसलब्लोअर सुरक्षा जैसे उपाय जरूरी हैं।
अंततः स्वास्थ्य सेवा सिर्फ व्यापार नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी है। जब तक सिस्टम में ईमानदारी और जवाबदेही नहीं होगी, तब तक सुधार अधूरा रहेगा। लेकिन जागरूक नागरिक, सशक्त मीडिया और मजबूत कानूनी ढांचा मिलकर इस चुनौती का सामना कर सकते हैं।
यह विशेष रिपोर्ट दिखाती है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की जरूरत है, लेकिन उम्मीद भी है—क्योंकि हर घोटाले के बाद जवाबदेही की मांग और मजबूत होती है।
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