सिग्नल से दरगाह तक: भारत में संगठित भीख नेटवर्क का अनुमानित सालाना टर्नओवर

विशेष रिपोर्ट |

देश के बड़े शहरों में ट्रैफिक सिग्नल, रेलवे स्टेशन, बाजार, मंदिर-मस्जिद और दरगाहों के बाहर भिखारियों की लंबी कतारें अब आम दृश्य हैं। सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि इस अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के पैमाने का है। विभिन्न शोध, मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस कार्रवाइयों से संकेत मिलता है कि कुछ हिस्सों में भीख मांगना संगठित नेटवर्क के रूप में भी चलता है—जहाँ कमाई का हिस्सा “हैंडलर” या गिरोह तक जाता है।

सटीक राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि यह गतिविधि अनौपचारिक और छिपी हुई है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 4.13 लाख “भिक्षुक/वग्रेंट” दर्ज थे; विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, खासकर महानगरों में। कई शहरों में स्थानीय पुलिस ने समय-समय पर संगठित रैकेट का खुलासा किया है, जहाँ बच्चों/दिव्यांगों का दुरुपयोग कर वसूली कराई जाती थी। इन मामलों में मानव तस्करी और बंधुआ श्रम जैसी धाराएँ भी लगाई गई हैं।

आर्थिक अनुमान कैसे लगाएँ? फील्ड स्टडीज़ और सामाजिक कार्यकर्ताओं के इंटरव्यू के आधार पर बड़े शहरों के व्यस्त सिग्नल/धार्मिक स्थलों पर एक व्यक्ति की दैनिक वसूली 300 से 1,500 रुपये तक बताई जाती है; त्योहारों और जुमे/साप्ताहिक बाजार के दिनों में यह अधिक हो सकती है। एक सतर्क, रूढ़िवादी आकलन के लिए यदि औसत 600 रुपये प्रतिदिन और 300 कामकाजी दिन मानें, तो प्रति व्यक्ति सालाना लगभग 1.8 लाख रुपये बनते हैं। यदि देशभर में सक्रिय व्यक्तियों की संख्या 5–8 लाख के बीच मान ली जाए (शहरी केंद्रों में उच्च घनत्व के साथ), तो सकल वार्षिक प्रवाह 9,000 से 14,400 करोड़ रुपये के दायरे में बैठ सकता है। यह केवल अनुमान है; वास्तविकता शहर-दर-शहर भिन्न होगी।

संगठित नेटवर्क की स्थिति में कमाई का बँटवारा होता है। पुलिस मामलों में सामने आया है कि कुछ जगहों पर “स्पॉट” का किराया या प्रतिशत लिया जाता है—मसलन 30–50% तक। यदि सकल प्रवाह का एक तिहाई भी गिरोहों तक जाता हो, तो यह अपने-आप में हज़ारों करोड़ की समानांतर नकद अर्थव्यवस्था हो सकती है। नकदी आधारित होने के कारण इस पर कराधान या औपचारिक निगरानी नहीं के बराबर है।

कानूनी परिदृश्य भी जटिल है। कई राज्यों में पुराने “भिक्षावृत्ति निरोधक” कानून हैं, लेकिन अदालतों ने समय-समय पर कहा है कि गरीबी को अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भिक्षावृत्ति को अपराध मानने वाले प्रावधानों को निरस्त किया था। नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती दोहरी है—संगठित शोषण पर सख्ती और वास्तविक जरूरतमंदों के पुनर्वास का संतुलन।

सामाजिक-आर्थिक कारक—ग्रामीण बेरोज़गारी, पलायन, मानसिक स्वास्थ्य, नशा, विकलांगता और आपदा—लोगों को सड़कों पर धकेलते हैं। धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ दान को बढ़ावा देती हैं, जिससे मांग-आपूर्ति का चक्र बनता है। डिजिटल भुगतान के बढ़ने के बावजूद नकद दान प्रमुख है, जो ट्रैकिंग को कठिन बनाता है।

समाधान क्या हो सकते हैं? विशेषज्ञ बहु-स्तरीय रणनीति सुझाते हैं:

  1. संगठित रैकेट पर लक्षित पुलिस कार्रवाई और त्वरित ट्रायल।
  2. शेल्टर होम, कौशल प्रशिक्षण और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए पुनर्वास।
  3. भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में सोशल वर्कर-आधारित आउटरीच।
  4. नागरिक जागरूकता—नकद देने की जगह प्रमाणित संस्थाओं को दान।
  5. डेटा-आधारित सर्वे ताकि वास्तविक पैमाना समझा जा सके।

निष्कर्ष स्पष्ट है: यह सिर्फ मानवीय संकट नहीं, बल्कि एक बड़ी नकद अर्थव्यवस्था का भी सवाल है। संगठित शोषण पर सख्ती और जरूरतमंदों के लिए गरिमापूर्ण विकल्प—दोनों साथ-साथ चलें, तभी सिग्नल से दरगाह तक फैले इस परिदृश्य में ठोस बदलाव संभव है।

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