नई दिल्ली: देशभर में आज जिस विषय ने राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक चर्चा बटोरी, वह है आगामी डिजिटल जनगणना 2027 की तैयारियाँ और इसके साथ-साथ राज्यों में प्रशासनिक सुधारों की रफ्तार। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा हाल के दिनों में लिए गए फैसलों ने यह संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में डेटा-आधारित शासन व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, पहली बार देश की जनगणना पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संचालित करने की तैयारी की जा रही है। मोबाइल एप आधारित डेटा संग्रह, स्वयं-पंजीकरण की सुविधा और प्रशिक्षित फील्ड कर्मियों की तैनाती के माध्यम से इस प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज़ बनाने की योजना है। अधिकारियों का कहना है कि इससे न केवल समय की बचत होगी बल्कि त्रुटियों में भी कमी आएगी।
इसी के समानांतर, विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, पुलिस आधुनिकीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से जुड़ी योजनाओं को गति दी जा रही है। महाराष्ट्र में पल्लिएटिव केयर कार्यक्रम के विस्तार, उत्तर प्रदेश में Anganwadi और ASHA कार्यकर्ताओं के मानदेय में वृद्धि, हरियाणा में पुलिस आधुनिकीकरण के लिए बजट आवंटन और पंजाब में लंबित रेलवे ओवरपास परियोजनाओं के तेज़ निष्पादन जैसे कदमों ने प्रशासनिक सक्रियता को रेखांकित किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल शासन और सामाजिक कल्याण योजनाओं का यह संयोजन भविष्य की नीति-निर्माण प्रक्रिया को मजबूत करेगा। बेहतर डेटा संग्रह से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार योजनाओं को अधिक लक्षित तरीके से लागू किया जा सकेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह पहल केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि “गवर्नेंस मॉडल” में परिवर्तन का संकेत है, जहाँ टेक्नोलॉजी, पारदर्शिता और जवाबदेही को केंद्र में रखा जा रहा है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि डिजिटल प्रणाली को लागू करते समय ग्रामीण और तकनीकी रूप से कमजोर वर्गों तक पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।
फिलहाल, डिजिटल जनगणना और राज्यों में विकास योजनाओं की यह संयुक्त रफ्तार राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनी हुई है। आने वाले महीनों में इन पहलों का प्रभाव जमीन पर किस रूप में दिखेगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
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