युद्ध के बीच अमेरिका और रूस के साथ भारत का व्यापार: संतुलन की रणनीति

 

अंतरराष्ट्रीय व्यापार समाचार | विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली। दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की व्यापार नीति एक बार फिर चर्चा में आ गई है। अमेरिका, रूस और मध्य पूर्व से जुड़े हालिया घटनाक्रमों के कारण ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत ने अपनी आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संतुलित रणनीति अपनाई है।

सबसे बड़ा मुद्दा कच्चे तेल के व्यापार से जुड़ा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब रूस ने अपने कच्चे तेल को छूट पर बेचना शुरू किया। इस वजह से भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने लगा और कुछ समय के लिए भारत रूस के तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया।

हाल ही में मध्य पूर्व में बढ़ते युद्ध और ईरान से जुड़े तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। इस स्थिति को देखते हुए अमेरिका ने भारत को अस्थायी राहत देते हुए रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी है। यह अनुमति लगभग 30 दिनों के लिए दी गई है ताकि ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो और वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके।

रिपोर्ट्स के अनुसार यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण तेल परिवहन और आपूर्ति पर खतरा बढ़ गया है। यदि भारत जैसे बड़े आयातक देशों को पर्याप्त तेल नहीं मिलता, तो वैश्विक बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और इसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह छूट केवल सीमित समय के लिए है और मुख्य रूप से उन रूसी तेल कार्गो पर लागू होती है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। इसका उद्देश्य बाजार को स्थिर रखना है, न कि रूस को आर्थिक लाभ पहुंचाना।

दूसरी ओर भारत ने भी स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी भी बाहरी दबाव के आधार पर नहीं बल्कि अपनी राष्ट्रीय जरूरतों के अनुसार तय होती है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश को अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है और इसी कारण भारत विभिन्न देशों से तेल खरीदता है।

अमेरिका के साथ भारत का व्यापार भी लगातार बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है और यह 130 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। इस व्यापार में भारत को अमेरिका के साथ अच्छा व्यापार अधिशेष भी प्राप्त हो रहा है।

इसके अलावा भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर भी चर्चा हुई है। इस समझौते के तहत अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर लगाए गए शुल्क को लगभग 50 प्रतिशत से घटाकर करीब 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

हालांकि अमेरिका चाहता है कि भारत धीरे-धीरे रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करे और अन्य देशों से तेल खरीदने के विकल्प तलाशे। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत आने वाले समय में ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाने की रणनीति अपना सकता है, जिसमें अमेरिका, वेनेजुएला और मध्य पूर्व के अन्य देशों से तेल खरीदना शामिल हो सकता है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत “संतुलन की नीति” अपना रहा है। एक ओर वह रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा लागत कम करने की कोशिश करता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत व्यापारिक और तकनीकी संबंध भी बनाए रखता है।

विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले महीनों में यदि युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव जारी रहता है तो वैश्विक व्यापार में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हितों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखे।

कुल मिलाकर देखा जाए तो वर्तमान स्थिति में भारत की व्यापार नीति व्यावहारिक और रणनीतिक दोनों नजर आती है। युद्ध के बीच भी भारत अपनी आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और रूस दोनों के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, ताकि देश की ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर कोई बड़ा असर न पड़े।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ