पुरानी और नई फिल्मों की सोच पर टकराव, दर्शकों के बीच उठे दोहरे मानदंड के सवाल
रिपोर्ट:
हाल के दिनों में भारतीय सिनेमा को लेकर एक नई बहस सोशल मीडिया पर तेजी से उभरकर सामने आई है। यह बहस दो फिल्मों—एक तरफ हालिया ‘धुरंधर’ सीरीज और दूसरी तरफ सालों पुरानी फिल्म ‘मैं हूँ ना’—के इर्द-गिर्द घूम रही है। मुद्दा सिर्फ फिल्मों का नहीं, बल्कि उनके जरिए पेश किए गए नैरेटिव और कथित “प्रोपेगेंडा” का है।
सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने सवाल उठाया है कि आखिर किसे प्रोपेगेंडा कहा जाना चाहिए—वह फिल्म जो आज देशभक्ति और सुरक्षा के मुद्दों को सीधे तौर पर दिखा रही है, या वह फिल्म जिसने मनोरंजन के माध्यम से एक अलग तरह का संदेश दर्शकों तक पहुंचाया। इस बहस ने फिल्म इंडस्ट्री के पुराने और नए दौर के बीच एक स्पष्ट वैचारिक टकराव को सामने ला दिया है।
‘मैं हूँ ना’, जो अपने समय में एक बड़ी हिट फिल्म रही थी, को लंबे समय तक एक हल्की-फुल्की, मनोरंजक और “अमन की आशा” को बढ़ावा देने वाली फिल्म के रूप में देखा गया। इसमें कॉलेज लाइफ, गाने और रोमांस के साथ एक संवेदनशील कहानी पेश की गई थी। हालांकि, अब कुछ लोग इस फिल्म को एक अलग नजरिए से देख रहे हैं।
आलोचकों का कहना है कि फिल्म में मुख्य खलनायक का किरदार एक पूर्व भारतीय सैनिक का होना, और उसे देश के लिए खतरे के रूप में दिखाना, एक विशेष नैरेटिव को दर्शाता है। उनके अनुसार, यह प्रस्तुति दर्शकों के अवचेतन मन में यह धारणा स्थापित कर सकती है कि खतरा हमेशा बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी हो सकता है।
इसी के साथ, फिल्म में दिखाए गए “प्रोजेक्ट मिलाप” जैसे कॉन्सेप्ट को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इस तरह की कल्पनात्मक अवधारणाओं को एक तरह की वास्तविक नीति की तरह पेश किया गया, जो जमीन की हकीकत से मेल नहीं खाती। उनके अनुसार, यह दर्शकों की भावनाओं को प्रभावित करने का एक सूक्ष्म तरीका हो सकता है।
दूसरी ओर, ‘धुरंधर’ सीरीज को लेकर भी बहस कम नहीं है। इस सीरीज को लेकर एक वर्ग का मानना है कि इसमें देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा को जिस तरह से दिखाया गया है, वह एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देता है। वहीं, इसके समर्थकों का कहना है कि यह फिल्में केवल वास्तविक मुद्दों को सामने ला रही हैं और लंबे समय से चले आ रहे “सॉफ्ट नैरेटिव” को चुनौती दे रही हैं।
यही टकराव अब “डबल स्टैंडर्ड” यानी दोहरे मानदंड की बहस में बदल गया है। कुछ यूज़र्स का तर्क है कि जब पहले फिल्मों के जरिए एक खास तरह की सोच को बढ़ावा दिया जा रहा था, तब उसे मनोरंजन और कला के रूप में स्वीकार किया गया। लेकिन अब जब नई फिल्में एक अलग दृष्टिकोण पेश कर रही हैं, तो उन्हें प्रोपेगेंडा कहकर खारिज किया जा रहा है।
फिल्म समीक्षकों और विश्लेषकों का कहना है कि सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है, लेकिन साथ ही यह दर्शकों की सोच को प्रभावित करने की ताकत भी रखता है। इसलिए यह जरूरी है कि दर्शक किसी भी फिल्म को सिर्फ भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तार्किक दृष्टिकोण से भी देखें।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आज के समय में सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह वैचारिक बहस का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। सोशल मीडिया ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जहाँ हर दर्शक अपनी राय खुलकर रख रहा है।
फिलहाल, यह कहना मुश्किल है कि कौन-सी फिल्म “सही” है और कौन-सी “प्रोपेगेंडा”, क्योंकि यह काफी हद तक व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। लेकिन इतना जरूर है कि इस बहस ने दर्शकों को फिल्मों को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित किया है।
अंततः, सिनेमा का असली मूल्य शायद इसी में है कि वह सवाल उठाए, चर्चा को जन्म दे और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करे—चाहे वह ‘मैं हूँ ना’ हो या ‘धुरंधर’।
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