पिपरमिंट (मेंटहा) की खेती से किसानों की बढ़ी कमाई, सुगंधित फसल बन रही नया मुनाफे का जरिया 🌿💰

 

पिपरमिंट (मेंटहा) की खेती कैसे करें – ग्राउंड रिपोर्ट

कृषि रिपोर्ट | 1000 शब्द के आसपास समझाने वाली

भारत में पिपरमिंट यानी मेंथा की खेती किसानों के लिए नकदी फसल बन चुकी है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और बिहार में इसकी खेती तेजी से बढ़ रही है। खासकर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, रामपुर, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर और लखीमपुर खीरी जिले में यह बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। इस पौधे से निकलने वाला मेंथा ऑयल दवा, टूथपेस्ट, च्युइंग गम, कॉस्मेटिक और सुगंधित उत्पादों में इस्तेमाल होता है, इसलिए बाजार में इसकी मांग बनी रहती है।

जमीन और मौसम

पिपरमिंट की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए क्योंकि जड़ों को नुकसान हो सकता है। मिट्टी का पीएच लगभग 6 से 7.5 के बीच अच्छा रहता है।

मौसम की बात करें तो हल्की गर्मी और नमी वाली जलवायु इस फसल के लिए सही रहती है। उत्तर भारत में यह फसल फरवरी से जून के बीच अच्छी तरह तैयार हो जाती है।

खेत की तैयारी

किसान सबसे पहले खेत को अच्छी तरह जोतते हैं। सामान्यतः

• 2 से 3 बार गहरी जुताई
• उसके बाद पाटा लगाकर मिट्टी को समतल करना
• खेत में गोबर की खाद मिलाना

लगभग 10 से 15 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालना अच्छा माना जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

बीज नहीं, जड़ से होती है खेती

पिपरमिंट की खेती बीज से नहीं बल्कि जड़ या रनर (stolon) से की जाती है। किसान पुराने पौधों की जड़ों को काटकर नए खेत में लगाते हैं।

रोपाई का समय आमतौर पर फरवरी से मार्च होता है। किसान जड़ों को 40 से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में लगाते हैं।

खाद और उर्वरक

मेंटहा की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित उर्वरक जरूरी होते हैं।

आमतौर पर किसान डालते हैं

• नाइट्रोजन – 100 से 120 किलो प्रति हेक्टेयर
• फास्फोरस – 40 से 60 किलो
• पोटाश – 40 किलो

नाइट्रोजन को दो या तीन बार में देना बेहतर रहता है ताकि पौधों की बढ़वार अच्छी हो।

सिंचाई

पिपरमिंट को नमी पसंद होती है। इसलिए खेत में समय-समय पर पानी देना जरूरी है।

• पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद
• उसके बाद हर 12 से 15 दिन में

गर्मी ज्यादा होने पर पानी की जरूरत बढ़ जाती है।

खरपतवार नियंत्रण

पौधे छोटे होने पर घास-फूस जल्दी बढ़ जाती है, इसलिए

• 2 से 3 बार निराई-गुड़ाई करनी पड़ती है
• कुछ किसान हल्की दवा का इस्तेमाल भी करते हैं

साफ खेत में पैदावार ज्यादा होती है।

फसल कब तैयार होती है

पिपरमिंट लगभग 90 से 110 दिन में तैयार हो जाती है

जब पौधे में फूल आने लगते हैं और पत्तियों में खुशबू तेज हो जाती है तब कटाई का सही समय होता है। आमतौर पर जून महीने में कटाई की जाती है।

तेल कैसे निकाला जाता है

कटाई के बाद पौधों को सीधे बाजार नहीं बेचा जाता। उनसे तेल निकाला जाता है।

इस प्रक्रिया को डिस्टिलेशन कहते हैं।

  1. पौधों को काटकर मशीन में डाला जाता है
  2. भाप दी जाती है
  3. भाप के साथ तेल निकलता है
  4. उसे ठंडा करके अलग किया जाता है

इसी को मेंटहा ऑयल कहते हैं।

पैदावार और कमाई

एक हेक्टेयर खेत से सामान्यतः

• 200 से 300 क्विंटल हरा मेंथा
• लगभग 150 से 200 किलो तेल

निकाला जा सकता है।

मेंटहा ऑयल की कीमत बाजार में बदलती रहती है। कई बार इसका भाव 900 से 1500 रुपये प्रति किलो तक भी पहुंच जाता है। ऐसे में किसान को अच्छा मुनाफा मिल सकता है।

किसानों के लिए फायदे

मेंटहा की खेती के कई फायदे हैं।

• कम समय में तैयार होने वाली फसल
• अच्छी बाजार मांग
• निर्यात में उपयोग
• नकदी फसल

इसी वजह से गेहूं के बाद कई किसान इसे उगाते हैं।

चुनौतियां

हालांकि इस खेती में कुछ समस्याएं भी आती हैं।

• बाजार में कीमत गिरना
• मौसम की मार
• डिस्टिलेशन मशीन की लागत

इसलिए कई किसान मिलकर कॉमन डिस्टिलेशन यूनिट लगाते हैं।

भविष्य

भारत दुनिया में मेंथा ऑयल का सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बनी हुई है। अगर किसानों को सही तकनीक, बाजार जानकारी और प्रोसेसिंग सुविधा मिले तो यह खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती है।

सीधी बात यह है कि पिपरमिंट की खेती खेत में खुशबू उगाने जैसा है। पौधा छोटा है, लेकिन इससे निकलने वाला तेल दुनिया भर की चीजों में इस्तेमाल होता है। खेत से फैक्ट्री और फिर वैश्विक बाजार तक, यह फसल किसानों के लिए कम समय में कमाई का मजबूत जरिया बन सकती है।

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