
बात करेंगे फिल्म इंडस्ट्री के उन बड़े विवादों की, जिन्होंने सिर्फ मनोरंजन जगत नहीं बल्कि पूरे देश में सत्ता, शक्ति और शोषण पर बहस छेड़ दी। बिना मसाला लगाए, सीधे तथ्य, नाम और कानूनी स्थिति के साथ।
सबसे बड़ा झटका 2018 में आया जब #MeToo आंदोलन ने बॉलीवुड को हिला दिया। इसकी शुरुआत तनुश्री दत्ता ने की। उन्होंने वरिष्ठ अभिनेता नाना पाटेकर पर 2008 की फिल्म “हॉर्न ओके प्लीज” के सेट पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। मामला पुलिस तक पहुँचा, FIR दर्ज हुई, लेकिन बाद में पुलिस ने सबूतों के अभाव में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। कोर्ट में आरोप सिद्ध नहीं हो पाए। कानूनी तौर पर पाटेकर को राहत मिली, लेकिन इस केस ने इंडस्ट्री की कार्यसंस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
इसी दौर में निर्देशक साजिद खान पर कई अभिनेत्रियों और मॉडल्स ने अनुचित व्यवहार और यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। “हाउसफुल 4” के निर्देशन से उन्हें हटाया गया। उनके खिलाफ कोई आपराधिक सजा नहीं हुई, लेकिन पेशेवर छवि को बड़ा नुकसान हुआ। बाद में वे रियलिटी शो “बिग बॉस” में दिखे तो फिर से विवाद भड़क उठा।
गीतकार अनु मलिक पर भी कई गायिकाओं ने उत्पीड़न के आरोप लगाए। वे “इंडियन आइडल” से हटाए गए। उन्होंने आरोपों से इनकार किया। मामला कानूनी रूप से आगे नहीं बढ़ा, पर सार्वजनिक बहस लंबी चली।
एक और चर्चित नाम था फिल्ममेकर विकास बहल। उन पर “फैंटम फिल्म्स” की एक महिला कर्मचारी ने यौन शोषण का आरोप लगाया। आंतरिक जांच के बाद उन्हें कंपनी से अलग किया गया। बाद में अदालत में वे आपराधिक रूप से दोषी सिद्ध नहीं हुए, लेकिन मामला कॉर्पोरेट गवर्नेंस और प्रोडक्शन हाउस की जवाबदेही पर मिसाल बन गया।
अब साउथ इंडस्ट्री की तरफ चलते हैं। 2017 में मलयालम अभिनेत्री के अपहरण और उत्पीड़न का मामला सामने आया। इस केस में अभिनेता दिलीप का नाम आया। उन्हें गिरफ्तार किया गया और लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। मामला अब भी अदालत में विचाराधीन रहा है और अंतिम फैसला कई वर्षों तक लंबित रहा। यह केस साउथ सिनेमा में शक्ति संतुलन और महिला कलाकारों की सुरक्षा पर बड़ी बहस बना।
तेलुगु इंडस्ट्री में अभिनेत्री श्री रेड्डी ने 2018 में कई निर्माताओं और कलाकारों पर “कास्टिंग काउच” के आरोप लगाए। उन्होंने सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया। पुलिस केस दर्ज हुए, लेकिन अधिकांश मामलों में ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि, इस घटना के बाद तेलुगु फिल्म चैंबर को आंतरिक शिकायत तंत्र मजबूत करना पड़ा।
तमिल इंडस्ट्री में प्रसिद्ध सिंगर चिन्मयी श्रीपदा ने गीतकार वायरामुथु पर गंभीर आरोप लगाए। वायरामुथु ने आरोपों को नकारा। कोई आपराधिक सजा नहीं हुई, लेकिन इस केस ने साउथ के #MeToo विमर्श को गहरा किया।
अब भोजपुरी इंडस्ट्री की बात करें। यहाँ विवाद अक्सर व्यक्तिगत संबंधों और सोशल मीडिया के जरिए सामने आए। अभिनेत्री आकांक्षा दुबे की मृत्यु ने इंडस्ट्री में मानसिक स्वास्थ्य, दबाव और कथित शोषण पर सवाल खड़े किए। पुलिस जांच चली और मामले में अभिनेता समर सिंह से पूछताछ हुई। केस की कानूनी प्रक्रिया जारी रही। यह मामला सेक्स स्कैंडल नहीं बल्कि उद्योग में दबाव और व्यक्तिगत संबंधों की जटिलता का उदाहरण बना।
भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह और अभिनेत्री अक्षरा सिंह के बीच सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप भी चर्चा में रहे। अक्षरा ने मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए। मामला अदालत और मीडिया दोनों में चला। हालांकि आपराधिक सजा जैसी स्थिति नहीं बनी।
इन सब मामलों से एक पैटर्न दिखता है। फिल्म इंडस्ट्री में शक्ति का केंद्रीकरण, काम की अस्थिर प्रकृति और ग्लैमर की आड़ में चुप्पी का दबाव लंबे समय तक बना रहा। #MeToo ने पहली बार इस चुप्पी को तोड़ा। लेकिन हर आरोप अदालत में दोष सिद्धि तक नहीं पहुँचा। इसका मतलब यह नहीं कि शिकायतें झूठी थीं या सच्ची — इसका मतलब सिर्फ इतना है कि कानूनी प्रणाली सबूतों पर चलती है।
आज स्थिति कुछ बदली है। कई प्रोडक्शन हाउस अब इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी रखते हैं। अनुबंधों में क्लॉज जोड़े गए हैं। सोशल मीडिया ने शक्ति संतुलन बदला है। फिर भी, ग्लैमर की दुनिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं हुई है।
यह समझना जरूरी है कि “स्कैंडल” शब्द मीडिया बनाता है, लेकिन असली मुद्दा है कार्यस्थल पर सम्मान, सहमति और जवाबदेही। हर आरोप अदालत में परखा जाना चाहिए। हर कलाकार को कानून के तहत समान अधिकार मिलना चाहिए। और हर इंडस्ट्री को अपनी आंतरिक संस्कृति सुधारनी चाहिए।
फिल्में सपने बेचती हैं, लेकिन उन सपनों के पीछे काम करने वाले लोगों की गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यही इस पूरी कहानी का असली केंद्र है।
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