नई दिल्ली | वैचारिक डेस्क दिनांक: 5 फरवरी, 2026
इन दिनों पूरी दुनिया 'एपस्टीन फाइल्स' के पन्ने पलट रही है। रसूखदार नाम, रूह कंपा देने वाले शोषण के किस्से और सत्ता की हनक में छिपे घिनौने अपराधों पर हर तरफ चर्चा है। लेकिन इस वैश्विक आक्रोश के बीच एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या हम वास्तव में इस क्रूरता से हैरान हैं, या हम केवल उस 'फाइल' के बन जाने का इंतज़ार कर रहे थे जो हमारे सामने कभी खुली ही नहीं?
सत्ता, वासना और शोषण का पुराना नाता
एपस्टीन केस ने यह साबित किया कि जब पैसा और शक्ति असीमित हो जाती है, तो इंसान उन चीजों को भोगने की इच्छा करने लगता है जो समाज और नैतिकता की सीमाओं के परे हैं। बच्चों का शारीरिक शोषण, अमानवीय कृत्य और क्रूरता अक्सर उन लोगों के शौक बन जाते हैं जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता। लेकिन क्या यह प्रवृत्ति केवल हॉलीवुड के बंगलों या निजी टापुओं तक सीमित है?
हमारे आसपास के 'मिनी-एपस्टीन'
हमें 'म्लेच्छ' (अधर्मी/क्रूर) और आततायी बनने के लिए किसी टापू या अरबों डॉलर की जरूरत नहीं है। समाज का बारीक विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि शोषण की यह मानसिकता हमारे घरों की दीवारों के भीतर भी मौजूद है।
- पारिवारिक हिंसा: क्या हमने उन सास-ससुर या पतियों को नहीं देखा जो अपनी ही बहुओं और बेटियों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं?
- घरेलू शोषण: क्या हमने उस 'सामान्य' आदमी को नहीं देखा जो अपने घर में काम करने वाले गरीब कर्मचारी से जानवरों जैसा व्यवहार करता है?
- सौतेला व्यवहार: समाज में सौतेले माता-पिता द्वारा बच्चों पर किए जाने वाले अत्याचारों की खबरें आए दिन आती हैं, लेकिन वे कभी 'ग्लोबल हेडलाइन' नहीं बनतीं।
शक्ति का मनोविज्ञान: जहाँ मौका मिला, वहाँ शोषण किया
सत्य यह है कि इंसान की क्रूरता केवल उसके संसाधनों पर निर्भर करती है। जिसके पास जितना मौका और जितनी ताकत है, वह उतने ही स्तर पर अपनी 'म्लेच्छता' का प्रदर्शन करता है। एपस्टीन के पास अरबों रुपये थे, तो उसने दुनिया भर में जाल बिछाया। एक सामान्य आदमी के पास केवल अपने घर या दफ्तर की सत्ता है, तो वह वहीं अपनी ताकत आज़माता है।
दोष केवल उन नामों का नहीं है जो फाइलों में दर्ज हैं, दोष उस सोच का है जो किसी कमजोर को देखकर उसे अपनी जागीर समझने लगती है।
हमारा दोहरा मापदंड
हम एपस्टीन फाइल्स पर इसलिए रो रहे हैं क्योंकि वह भयावह है, लेकिन हम अपने पड़ोस में हो रहे शोषण पर मौन रहते हैं क्योंकि वह 'सामान्य' लगने लगा है। हम उन लोगों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाते जो हमारे अपने हैं, लेकिन सात समंदर पार बैठे अपराधियों पर कीबोर्ड के जरिए पत्थर फेंकना आसान है।
निष्कर्ष: हम और हमारी अपनी फाइलें
एपस्टीन की तो फाइल बन गई, इसलिए वह अपराधी है। लेकिन उन अनगिनत फाइलों का क्या जो कभी लिखी ही नहीं गईं? जो हमारे समाज के हर गली-मोहल्ले और ड्राइंग रूम में हर दिन 'अपडेट' हो रही हैं?
शायद कड़वा सच यही है कि हम सभी अपने-अपने हिस्से के थोड़े-थोड़े म्लेच्छ हैं। बस फर्क इतना है कि हमारी फाइलों को सार्वजनिक करने वाला कोई न्याय विभाग नहीं है। एपस्टीन फाइल्स पर हमारा आक्रोश तब तक खोखला है, जब तक हम अपने आसपास के बाहुबलियों और खुद के भीतर छिपे शोषक को नहीं पहचान लेते।
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