पुरानी खेती ज़्यादा पौष्टिक या आधुनिक खेती बेहतर? बदलते दौर में पोषण पर बड़ा सवाल

डेस्क रिपोर्ट | नई दिल्ली | 13 फरवरी 2026

पुराने ज़माने की खेती बनाम आधुनिक खेती: पोषण में कितना आया बदलाव?

खेती सिर्फ अनाज उगाने की प्रक्रिया नहीं है, यह सीधे हमारी थाली और हमारे शरीर की सेहत से जुड़ी है। पिछले कुछ दशकों में खेती के तरीके तेजी से बदले हैं। ट्रैक्टर, हाईब्रिड बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशकों ने उत्पादन तो बढ़ाया, लेकिन अब सवाल उठ रहा है — क्या पोषण भी उतना ही बेहतर हुआ है या कहीं कमी आ गई है?

विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने ज़माने की खेती पारंपरिक बीजों और प्राकृतिक खाद पर आधारित थी। गोबर की खाद, फसल चक्र (crop rotation) और मिश्रित खेती जैसी पद्धतियों से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी। मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जिंक, आयरन और मैग्नीशियम संतुलित मात्रा में मौजूद रहते थे। इसी वजह से उस दौर में उगने वाली सब्ज़ियों और अनाज में प्राकृतिक पोषक तत्वों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक मानी जाती है।

हरित क्रांति के बाद उत्पादन बढ़ाने के लिए हाईब्रिड और उच्च-उपज (high yield) वाली किस्मों को प्राथमिकता दी गई। इन बीजों का उद्देश्य अधिक अनाज देना था, न कि पोषण बढ़ाना। कई शोध बताते हैं कि पिछले 50–60 वर्षों में कुछ फसलों में प्रोटीन, आयरन और जिंक की मात्रा में कमी देखी गई है। इसका एक कारण मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भी माना जाता है।

आधुनिक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। इससे फसल तो जल्दी और अधिक मात्रा में तैयार होती है, लेकिन मिट्टी की जैविक संरचना प्रभावित होती है। मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव कम हो जाते हैं, जिससे पौधों को मिलने वाले पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। परिणामस्वरूप, दिखने में आकर्षक फल और सब्ज़ियां पोषण के स्तर पर पहले जैसी नहीं रह जातीं।

हालांकि आधुनिक खेती पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। आज बायोफोर्टिफिकेशन जैसी तकनीकें विकसित की जा रही हैं, जिनसे फसलों में आयरन, जिंक और विटामिन की मात्रा बढ़ाई जा सके। ऑर्गेनिक खेती और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता रुझान भी पोषण को बेहतर बनाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। कई किसान अब फिर से पारंपरिक बीजों और जैविक खाद की ओर लौट रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि असली समाधान संतुलन में है। केवल अधिक उत्पादन या केवल पारंपरिक तरीके — दोनों में से कोई भी अकेला पर्याप्त नहीं है। मिट्टी की सेहत, फसल विविधता और टिकाऊ खेती पद्धतियां अपनाकर ही पोषण और उत्पादन दोनों को संतुलित किया जा सकता है।

निष्कर्ष साफ है: पुराने ज़माने की खेती में पोषण स्वाभाविक रूप से मजबूत था, जबकि आज की खेती उत्पादन-केंद्रित है। अब चुनौती यह है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान को मिलाकर ऐसी खेती विकसित की जाए, जो मात्रा के साथ-साथ गुणवत्ता भी दे।

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