आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया फैशन का सबसे बड़ा मंच बन चुका है, लेकिन इसी के साथ एक गंभीर बहस भी तेज हो गई है। फैशन के नाम पर बढ़ती नग्नता और अश्लीलता को लेकर समाज के कई वर्गों में नाराजगी देखी जा रही है। इंस्टाग्राम, रील्स और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे कंटेंट की भरमार है, जहां कपड़ों की जगह शरीर को ज्यादा दिखाया जा रहा है।
फैशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि फैशन का मतलब रचनात्मकता, आत्म-अभिव्यक्ति और स्टाइल होता है, न कि सीमाएं तोड़ने के नाम पर केवल दिखावा। लेकिन सोशल मीडिया की लाइक और व्यूज़ की दौड़ में कई यूजर्स फैशन को एक्सपोज़र से जोड़कर पेश कर रहे हैं। इसका असर खासकर किशोरों और युवाओं पर साफ दिखाई दे रहा है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार इस तरह के कंटेंट को देखने से युवाओं की सोच प्रभावित हो रही है। आत्मसम्मान, बॉडी इमेज और रिश्तों को देखने का नजरिया बदल रहा है। कई माता-पिता भी इस बात को लेकर चिंता जता रहे हैं कि उनके बच्चे किस तरह के कंटेंट से प्रभावित हो रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिक सोच से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हर ट्रेंड को फैशन कहना सही है, या फिर कहीं यह सीमाओं का अतिक्रमण तो नहीं।
संस्कृति विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय समाज में फैशन हमेशा संतुलन और मर्यादा के साथ आगे बढ़ा है। पारंपरिक हो या आधुनिक, फैशन ने कभी भी अपनी जड़ों से दूरी नहीं बनाई। ऐसे में सोशल मीडिया पर बढ़ती नग्नता को फैशन कहना कई लोगों को स्वीकार नहीं है।
सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से भी कंटेंट मॉडरेशन को लेकर सख्त कदम उठाने की मांग उठ रही है। लोगों का मानना है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी है।
कुल मिलाकर, सोशल मीडिया पर फैशन के नाम पर हो रहे इस बदलाव ने एक जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ट्रेंड ही सब कुछ है, या समाज और संस्कृति की भी कोई भूमिका होनी चाहिए। यह बहस आने वाले समय में और गहरी होने की संभावना है।
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