नई दिल्ली = डेस्क
भारत में एस्कॉर्ट और कॉल गर्ल से जुड़े कारोबार को लेकर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन इसके वास्तविक आकार पर स्पष्ट और आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यह क्षेत्र आंशिक रूप से कानूनी, आंशिक रूप से प्रतिबंधित और बड़े स्तर पर अनौपचारिक या छिपे हुए नेटवर्क के तहत संचालित होता है। विशेषज्ञों और विभिन्न अध्ययनों के आधार पर तैयार किए गए अनुमान बताते हैं कि देश में यह कारोबार रोज़ाना सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
कितनी बड़ी है यह आबादी?
विभिन्न सामाजिक और स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में भारत में महिला सेक्स वर्कर्स की संख्या लाखों में बताई गई है। कुछ प्रोग्राम आधारित मैपिंग अध्ययनों के अनुसार यह संख्या करीब 9 से 10 लाख के आसपास हो सकती है। हालांकि, यह आंकड़ा पूरी तरह सटीक नहीं माना जा सकता क्योंकि बड़ी संख्या में काम करने वाली महिलाएं पंजीकृत या आधिकारिक डेटा में शामिल नहीं होतीं।
रोज़ाना कितना हो सकता है कारोबार?
इस क्षेत्र के रोज़ाना कारोबार का अनुमान निकालने के लिए तीन मुख्य आधार माने जाते हैं:
- कुल सक्रिय वर्कर्स की संख्या
- प्रति दिन औसतन ग्राहकों की संख्या
- प्रति ग्राहक ली जाने वाली फीस
अगर मान लिया जाए कि लगभग 10 लाख महिलाएं सक्रिय हैं और हर एक को औसतन एक ग्राहक प्रतिदिन मिलता है, जिसकी फीस लगभग 300 रुपये है, तो दैनिक कारोबार लगभग 30 करोड़ रुपये तक बैठता है।
वहीं, अगर औसत दो ग्राहक प्रतिदिन और प्रति ग्राहक 1000 रुपये का अनुमान लगाया जाए, तो यह आंकड़ा करीब 200 करोड़ रुपये प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।
उच्च श्रेणी की एस्कॉर्ट सेवाओं में फीस कई हजार रुपये तक होती है। यदि कुछ हिस्से में प्रतिदिन चार ग्राहक और औसत फीस 5000 रुपये मानी जाए, तो सैद्धांतिक रूप से यह कारोबार हजार करोड़ रुपये प्रतिदिन तक भी जा सकता है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह उच्च अनुमान राष्ट्रीय औसत नहीं हो सकता।
शहरों में ज्यादा सक्रिय नेटवर्क
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में यह गतिविधि अधिक संगठित और डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित हो चुकी है। सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स और वेबसाइट्स के जरिए ग्राहकों तक पहुंच बनाई जाती है। छोटे शहरों और कस्बों में यह नेटवर्क अधिकतर स्थानीय संपर्कों और निजी चैनलों से चलता है।
कमाई और वास्तविक आय में अंतर
यह समझना जरूरी है कि जो आंकड़े सामने आते हैं वे कुल कारोबार यानी ग्रॉस टर्नओवर को दर्शाते हैं। इसमें से बड़ी रकम एजेंटों, बिचौलियों, नेटवर्क संचालकों या अवैध गतिविधियों से जुड़े लोगों तक जाती है। कई मामलों में महिलाओं को कुल राशि का सीमित हिस्सा ही मिलता है।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि इस क्षेत्र में काम करने वाली कई महिलाएं आर्थिक मजबूरी, पारिवारिक दबाव या अन्य कारणों से जुड़ी होती हैं। वहीं, मानव तस्करी से जुड़े मामलों को लेकर भी गंभीर चिंताएं बनी रहती हैं।
कानून क्या कहता है?
भारत में वेश्यावृत्ति स्वयं पूरी तरह गैरकानूनी नहीं है, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर ग्राहकों को बुलाना, दलाली करना, कोठा चलाना या संगठित रूप से नेटवर्क संचालित करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। इसी कारण इस क्षेत्र का बड़ा हिस्सा भूमिगत रहता है, जिससे सटीक आर्थिक आंकड़े जुटाना कठिन हो जाता है।
स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव
राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य एजेंसियां इस क्षेत्र को सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से भी देखती हैं। एचआईवी और अन्य यौन संचारित रोगों की रोकथाम के लिए समय-समय पर विशेष कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इस वजह से सरकार और गैर-सरकारी संगठन इस समुदाय तक पहुंचने की कोशिश करते रहते हैं।
निष्कर्ष
उपलब्ध अध्ययनों और अनुमान आधारित गणनाओं के अनुसार भारत में एस्कॉर्ट और कॉल गर्ल से जुड़ा कारोबार रोज़ाना कम से कम 30 से 200 करोड़ रुपये के बीच हो सकता है। उच्च अनुमान इससे कहीं अधिक भी बताते हैं, लेकिन इन आंकड़ों में अनिश्चितता बनी रहती है।
यह क्षेत्र न केवल आर्थिक दृष्टि से बड़ा है, बल्कि सामाजिक, कानूनी और नैतिक बहस का भी विषय है। स्पष्ट और विश्वसनीय डेटा की कमी के कारण इसका सटीक आकार बताना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि यह देश की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण और जटिल हिस्सा बना हुआ है।
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